Friday, August 3, 2018

The Sound of Gravitational Waves

The Sound of Gravitational Waves


लेजर द्वारा गुरुत्वीय तरंगों की खोज और ब्रह्मांड की आवाज
                            सूर्य नारायण ठाकुर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय                      


गुरुत्वीय तरंगों के उत्पत्ति की कहानी ब्रह्माण्ड में उपस्थित विभिन्न प्रकार के दृश्य एवं अदृश्य तारों से
अभिन्न रूप से जुड़ी है। अत्यधिक भार एवं गुरूत्व वाले तारों के विस्फोट अथवा आपस मे टकराने से
गुरुत्वीय तरंगे उत्पन्न होती हैं जिसकी परिकल्पना महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन ने 1915 में किया था।
करीब 50 वर्ष के अथक शोध के बाद 14 सितंबर 2015 को पृथ्वी पर गुरुत्वीय तरंगों का मापन सम्भव
हो सका। वर्ष 2017 का भौतिकी में नोबेल पुरस्कार इस महान उपलब्धि के लिए प्रदान किया गया।
सर्वप्रथम जनवरी सन 1610 में गैलीलियो ने अपनी दूरबीन के द्वारा यह देखा था कि बृहस्पति एवं शनि
ग्रह के इर्दगिर्द कई चन्द्रमा वैसे ही चक्कर लगाते हैं जैसे पृथ्वी के चारो ओर एकलौता चन्द्रमा चक्कर
लगाता है। गैलीलियो की दूरबीन से प्रेरित, ब्रह्मांड की रचना से सम्बंधित बहुत सी खोजों के 400 वर्ष बाद
गुरुत्वीय तरंगों की खोज ने वैज्ञानिकों को एक ऐसी प्रणाली प्रदान की है जिसके द्वारा हम सुदूर ब्रह्मांड में
होनेवाली विध्वंसक घटनाओं को न केवल देख सकते है बल्कि सुन भी सकते हैं।

चित्र 1. गैलीलियो का टेलीस्कोप के साथ काल्पनिक चित्र (बायें) तथा वर्तमान में अंतरिक्ष में स्थित हब्बल टेलीस्कोप
द्वारा लिये गये फोटो में कुहरे की तरह दिख रही निहारिका के बीच जगमगाते तारे (दायें)


तारों की अजीबोगरीब दुनिया


भारत के ग्रामीण क्षेत्र में जब से बालक होश संभालता है, उसके लिये सबसे मनोहारी दृश्य रात को आकाश
में जगमगाते तारे होते हैं। बिजली की उपलब्धता से कृत्रिम प्रकाश के वायुमंडल में टकराने के कारण अब
रात को आकाश में तारे कुछ धूमिल दिखाई पड़ते हैं, मगर आज भी बच्चों को बहलाने के लिये चंदामामा,
सप्तऋषि मंडल तथा आकाशगंगा से जुड़ी अनेक कहानियां प्रचलित हैं। बिहार प्रान्त से मशहूर हुई छठ
पूजा एकमात्र ऐसा अवसर है जब डूबते हुए सूर्य की पूजा की जाती है। सूर्य को एक जीवंत देवता के रूप
में मानने की परंपरा हमारे देश मे अनादिकाल से प्रचलित है। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन से भी इस बात
की पुष्टि हो गई है कि बिना सूर्य के प्रकाश के पृथ्वी पर न तो वनस्पति और नही जीव जंतु का पाया जाना
संभव होता। अनेक प्रकार की टेलिस्कोप के द्वारा आकाश के अनगिनत तारों का अध्ययन करने के बाद
यह पता चला है कि ये तारे भी सूर्य के समान ही हैं। वास्तव में पृथ्वी के सबसे नजदीक स्थित सूर्य, एक
मध्यम श्रेणी का तारा है। आकाशीय ब्रह्माण्ड में अति विशालकाय तारे हैं जो सूर्य से हजारों गुना अधिक
प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। इन तारो के बीच अरबों, खरबो किलोमीटर की दूरी है और इस दूरी के मापन के
लिये किलोमीटर की जगह प्रकाश सेकेंड, प्रकाश मिनट एवं प्रकाश वर्ष का प्रयोग होता है। प्रकाश एवं
रेडियो तरंगे एक सेकेंड में करीब 3 लाख किलोमीटर की दूरी तय करती हैं। चन्द्रमा और पृथ्वी के बीच की
दूरी करीब 4 लाख किलोमीटर है या यह कह सकते हैं कि चन्द्रमा का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने में 1.3
सेकेंड लगता है। अतः पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच की दूरी 1.3 प्रकाश सेकेंड है। इसी प्रकार पृथ्वी और
सूर्य के बीच की दूरी 8.3 प्रकाश मिनट है। सूर्य के अलावा पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा करीब 4
प्रकाश वर्ष की दूरी पर है जिसका नाम अल्फा सेंटोरी है।
आकाश में पास पास दिखने वाले अनगिनत तारों  के समूह को गैलेक्सी या आकाशगंगा कहते हैं।
जिस आकाशगंगा में हमारा सौर मंडल स्थित है उसे दूधिया पथ (Milky way) वाली आकाशगंगा कहते
हैं। इसमे तारों की संख्या इतनी अधिक है कि रात के बादल रहित आकाश में यह सफेद पट्टी के रूप में
दिखाई पड़ती है। सर्वप्रथम सन 1610 में गैलीलियो ने जब अपनी टेलीस्कोप से इस पट्टी को देखा तो
उसमें अनगिनत तारे जगमगा रहे थे। बहुत दिनों तक यह धारणा बनी रही कि असंख्य तारों का यह समूह
ही पूरे ब्रह्मांड का निर्माण करता है। 20वीं सदी में अनेक प्रकार की अत्यधिक पॉवरफुल टेलिस्कोपों की
उपलब्धता ने ब्रह्माण्ड के अध्ययन के कई द्वार खोल दिये, जिससे यह पता चला कि ब्रह्मांड में हमारी
आकाशगंगा की तरह लाखों आकाशगंगा विचरण कर रही हैं जिनके बीच की दूरी करोडों एवं अरबों
प्रकाश वर्ष की है। हमारी आकाशगंगा का आकार एक जलेबी (spiral) जैसी चकती के समान है जिसका
व्यास करीब डेढ़ लाख प्रकाश वर्ष है। हमारी आकाशगंगा में सूर्य से कई गुना बड़े एवं अधिक प्रकाशवान
तारों के अलावा सूर्य से बहुत छोटे एवं कम प्रकाश वाले भी तारे विद्यमान हैं। तारो के अलावा आकाशगंगा
में धूल के काले या चमकीले बादल भी उपस्थित हैं जिन्हें निहारिका (Nebula) कहा जाता है (चित्र 1)।
टेलिस्कोप के निरीक्षण द्वारा यह पता चलता है कि तारों की उत्पत्ति निहारिकाओ के भीतर होती है, जैसा
चित्र 1 में दिखाया गया है। समय बीतने के साथ तारे के प्रकाश उत्सर्जन की क्षमता बढ़ती जाती है। इसका
सवसे प्रत्यक्ष उदाहरण हमारा सूर्य है, जिसकी वर्तमान आयु लगभग 5 अरब वर्ष है। यह भी देखा गया है
कि अति विशालकाय तारे में अचानक विस्फोट हो जाता है और उसका पदार्थ आकाश में छिटककर धूल
की बादल की तरह निहारिका का निर्माण कर देता है, जिसके केंद्र में अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण वाला एक
बहुत छोटे आकार का पिंड शेष रह जाता है। अनेक प्रकार की चमक एवं आकार वाले तारों के निरीक्षण
द्वारा वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि तारों का जीवन भी मानव जीवन की तरह है। तारे उत्पन्न होते
हैं, बड़े होते है और विस्फोट के बाद, अति छोटे आकार के, मगर अति विशाल गुरुत्वाकर्षण वाले तारे के
रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। यह जानकारी उसी प्रकार की है जैसे कि कोई अन्य ग्रह का प्राणी पृथ्वी के
किसी गाँव में घूमने लगे तो वहां उसे अबोध शिशु, बालक, जवान तथा वृद्ध मनुष्य दिखाई देंगे, जिसके
बाद उसे मानव जीवन की विभिन्न अवस्थायें स्वतः समझ में आ जावेंगी। ठीक उसी प्रकार टेलिस्कोप द्वारा
हमे आकाशगंगा में जन्म लेते हुए से लेकर मृत्यु के बीच तक की प्रत्येक अवस्था के तारे दिखाई देते हैं।

चित्र 2. भारतीय भौतिकविद मेघनाद साहा एवं हारवर्ड वेधशाला की खगोल वैज्ञानिक सिसिलिया पायेन के सन 1920 के
फोटो
भारतीय भौतिकविद मेघनाद साहा ने 1917 के पूर्ण सूर्यग्रहण के समय उसके वायुमंडल से
निकलने वाले प्रकाश के स्पेक्ट्रम का विस्तृत विश्लेषण किया था। इस अध्ययन द्वारा उन्होंने एक समीकरण
का निर्माण किया जिससे सूर्य तथा अन्य तारों की सतह के तापक्रम का अनुमान लगाना सम्भव हो गया।
मेघनाद साहा के समीकरण का उपयोग करते हुये 1925 में  अमेरिका की हारवर्ड वेधशाला में सिसिलिया
पायेन नामक महिला वैज्ञानिक ने अपनी डॉक्टरेट थीसिस में यह निष्कर्ष निकाला कि सूर्य तथा सभी
चमकीले तारों की संरचना में हाइड्रोजन गैस की मात्रा 90% से अधिक होती है (चित्र 2) । आधुनिक
जानकारी के अनुसार प्रत्येक तारे का जन्म निहारिका में स्थित धूल मिश्रित परमाणुओं के बादल से होता
है। जब यह विशाल बादल, अपने भीतर उपस्थित कणों के आपसी गुरुत्वाकर्षण की वजह से, संकुचित
होने लगता है तो ये कण आपस मे टकरा कर वैसी ही गर्मी उतपन्न करते हैं जैसे जाड़े के दिनों में हम अपनी
हथेलियों को रगड़कर प्राप्त करते हैं। जब इस विशाल बादल के केंद्र का तापक्रम 1 से 2 करोड़ डिग्री
सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है  तो केंद्र में स्थित हाइड्रोजन के परमाणु न्यूक्लियर संश्लेषण द्वारा हीलियम में
परिवर्तित होने लगते हैं। न्यूक्लियर संश्लेषण की यह प्रक्रिया हाइड्रोजन बम के विस्फोट की तरह होती है
और इसमें निकली ऊर्जा संकुचित बादल के केंद्र से रेडिएशन के रूप में बाहर की ओर प्रसारित होने लगती
है जिससे गैस का यह गोला एक तारे के रूप में चमकने लगता है। एक तारा वास्तव में हाईड्रोजन गैस का
एक विशाल गोला है जिसका आकार दो प्रकार के बलों के समन्वय या सामन्जस्य द्वारा निर्धारित होता है।
तारे के केंद्र से न्यूक्लियर संश्लेषण द्वारा उत्पन्न ऊर्जा का दबाव उसके आकार को बड़ा करने की दिशा में
काम करता है, जबकि गुरुत्वाकर्षण का बल तारे को केंद्र की ओर संकुचित करने की दिशा में काम करता
है। इन दो विपरीत बलों की रस्साकशी के चलते तारा एक निश्चित आकार के सन्तुलित गोले पिंड के रूप में
करोड़ों तथा अरबों वर्ष तक प्रकाश उत्सर्जित करता रहता है। हमारा सूर्य एक ऐसा तारा है जिसकी सतह
के गैस का तापक्रम करीब 6000 सेंटीग्रेड है तथा उसका व्यास 14 लाख किलोमीटर है। सूर्य के आकार
का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर यह खोखला होता तो उसके भीतर 10 लाख से
अधिक पृथ्वी के आकार के गोले फिट हो जाते। सूर्य एक मध्यम आकार का तारा है और ब्रह्मांड में इससे
लाखों गुना बड़े आकार के तथा इससे बहुत छोटे आकार के तारे हैं जो विभिन्न प्रकार की रंगबिरंगी चमक
के साथ रात्रि के समय आकाश में जगमगाते रहते हैं।


तारों की विस्फोटक मृत्यु


                         
चित्र 3 ब्रिटिश वैज्ञानिक फ्रेड हॉयल ने तारे के केंद्र में न्यूक्लियर संश्लेषण की प्रक्रिया के आधार पर सुपर-नोवा विस्फोट के
पहले उसके भीतर के रासायनिक तत्वों की संरचना को प्याज की परतों की तरह बताया जिसकी बाहरी परत में हाइड्रोजन
तथा केंद्र में लोहा होता है।


हमारे सूर्य की वर्तमान अनुमानित आयु 5 अरब वर्ष की है तथा यह अगले 5 अरब वर्ष तक इसी सन्तुलित
आकार में प्रकाश उत्सर्जित करता रहेगा। जब सूर्य के केंद्र में उपस्थित हाइड्रोजन, हीलियम में  परिवर्तित
हो जायेगी तो उसके केंद्र में न्यूक्लियर संश्लेषण की प्रक्रिया बंद हो जायेगी। ऐसी परिस्थिति में केंद्र से
बाहर की ओर ऊर्जा का प्रसार बंद हो जायेगा और गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में सूर्य का आकार संकुचित होने
लगेगा तथा इसका तापक्रम बढ़ने लगेगा। संकुचित तारे के केंद्र का तापक्रम एक निश्चित बिंदु से अधिक
होने पर उसके केंद्र में हीलियम के न्यूक्लियर संश्लेषण से कार्बन का निर्माण होने लगेगा और इस प्रक्रिया
द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा के फैलाव एवं गुरुत्वाकर्षण जनित संकुचन के बीच सन्तुलन से पुनः तारे का आकार
स्थिर हो जायेगा। तारों के केंद्रीय भाग में न्यूक्लियर संश्लेषण द्वारा हल्के रासायनिक तत्वों का भारी तत्वों
में परिवर्तित होने की प्रक्रिया द्वारा ऊर्जा के उत्पादन को एक रासायनिक भट्टी के रुप मे समझा जा सकता
है। तारे के केंद्रीय भाग में  हाइड्रोजन का ईंधन समाप्त होने पर हीलियम, उसके बाद कार्बन, फिर
सिलिकन आदि, ईंधन के रूप में प्रयुक्त होते हुये ऊर्जा उत्सर्जन के साथ साथ क्रमशः भारी रासायनिक
तत्वों का निर्माण करते जाते हैं। ब्रिटिश खगोलविद फ्रेड हॉयल ने 1954 में तथ्यों के आधार पर बताया कि
न्यूक्लियर संश्लेषण की प्रक्रिया तारे के केंद्रीय भाग में लोहा (iron) के न्यूक्लियस बनने के बाद रुक
जाती है और गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में तारे का संकुचन तेज हो जाता है (चित्र 3)। गुरुत्वाकर्षण के इस
अनियंत्रित खिंचाव की वजह से तारा एक भारी विस्फोट के साथ फूट जाता है और उसके भीतर न्यूक्लियर
संश्लेषण से बने सभी रासायनिक तत्व धूल के रूप में आकाश में फैल जाते हैं। इस विस्फोट को नोवा या
सुपर नोवा कहा जाता है और तारे का केन्द्रीय भाग सिकुड़ कर अत्यधिक घनत्व वाले छोटे पिंड का
आकार ले लेता है।             
तारे का जीवनकाल उसके आकार और द्रव्यमान पर निर्भर करता है। हम बता चुके हैं कि सूर्य का
जीवनकाल करीब 10 अरब वर्ष का है। सूर्य से छोटे तथा लाल रंग वाले बर्नार्ड नाम के तारे का व्यास
करीब 2.5 लाख किलोमीटर है और इसमें हाइड्रोजन से हीलियम का न्यूक्लियर संश्लेषण कई खरबों वर्षों
तक चलता रहेगा। सूर्य में न्यूक्लियर संश्लेषण द्वारा कार्बन का निर्माण होने पर विस्फोट के बाद जो छोटे
आकार का तारा बच जायेगा उसे श्वेत वामन (white dwarf) तारा कहा जायेगा। रात्रि के आकाश में
सबसे अधिक चमक वाले सीरियस-A नाम के तारे का व्यास करीब 24 लाख किलोमीटर है और वह् सूर्य
से करीब दोगुना भारी है। सीरियस-A में न्यूक्लियर संश्लेषण की क्रिया ज्यादा तेजी से होती है जिससे
इसका जीवनकाल सूर्य से कम होगा और विस्फ़ोट के बाद बनने वाले तारे को न्यूट्रॉन तारा
(neutron star) कहा जायेगा। रिगेल नामक तारे का व्यास करीब 11 करोड़ किलोमीटर है और यह
सूर्य से 23 गुना भारी है। रिगेल के भीतर न्यूक्लियर संश्लेषण की क्रिया सूर्य की अपेक्षा बहुत ही तेज है
जिससे इसका जीवनकाल उसी अनुपात में कम हो जायेगा। यह अनुमान है कि सुपर-नोवा विस्फ़ोट के
बाद रिगेल एक श्याम विवर या ब्लैक होल (black hole) बन जायेगा जिसका गुरुत्वाकर्षण इतना
अधिक होगा कि उससे प्रकाश भी बाहर नही निकल पायेगा। अतः ब्लैक होल एक अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण
वाला अत्यन्त छोटे आकार का अदृश्य तारा होता है।
ब्रिटिश खगोलविद आर्थर एडिंगटन ने सन 1920 में यह सुझाव दिया था कि सूर्य के केंद्रीय भाग में
हाइड्रोजन के हीलियम में परिवर्तन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा की वजह से वह प्रकाशवान बना रहता है। जैसा हम
ऊपर देख चुके हैं कि तारों में  न्यूक्लियर संश्लेषण की परिकल्पना 1950 के बाद की गयी। एडिंगटन के
अनुसार ऊर्जा का तारे के केंद्र से बाहर निकलने के दबाव को उसका गुरुत्वाकर्षण बल सन्तुलित कर देता
है जो तारे के आकार को निर्धारित करता है । एडिंगटन की परिकल्पना के अनुसार जो ज्यादा गुरुत्वाकर्षण
वाला तारा होगा उसका आकार उसी अनुपात में बड़ा होगा। इस परिकल्पना के अपवाद सिरियस-A और
सिरियस-B थे जो एक दूसरे का चक्कर लगाते पाये गये (चित्र 4)। सिरियस-A सूर्य से करीब दोगुना भारी
और रात्रि के आकाश में आँख से दिखने वाला सबसे ज्यादा चमकीला तारा है। इसके विपरीत सिरियस-B
भार में करीब सूर्य के बराबर मगर आकार में  पृथ्वी के बराबर अत्यंत क्षीण प्रकाश वाला तारा है। इस
ज्वलंत खगोलीय समस्या का समाधान 1930 में 20 वर्षीय भारतीय छात्र सुब्रमण्यम चंद्रशेखर द्वारा
अपनी मद्रास से कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की समुद्री यात्रा के दौरान किया गया (चित्र4)।

क्वांटम भौतिकी का उपयोग करते हुए चन्द्रशेखर ने यह निष्कर्ष निकाला कि गुरुत्वीय संकुचन के
कारण सूर्य के डेढ़ गुना भार से कम भार वाले तारों का आकार इतना छोटा और गुरुत्वाकर्षण बल इतना
अधिक होगा कि वे श्वेत वामन (white dwarf) तारे बन जायेंगे। श्वेत वामन तारे से अति क्षीण प्रकाश का
उत्सर्जन होता है क्योंकि इसमें  गुरुत्वीय बल द्वारा उत्पन्न संकुचित होने की प्रक्रिया का संतुलन तारे की
सतह पर स्थित इलेक्ट्रान गैस के विकर्षण बल से उत्पन्न फैलाव द्वारा होता है। खेद की बात है कि
चन्द्रशेखर की यह महत्वपूर्ण व्याख्या (Chandrasekhar limit) एडिंगटन के विरोध के कारण कई
दशक तक खगोल वैज्ञानिकों द्वारा स्वीकार नही की गयी।
1960 के दशक में गुरुत्वाकर्षण के सैद्धान्तिक क्षेत्र के वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सूर्य
से दो गुना भार से बड़े तारों में संकुचन के बाद गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक होगा कि उनका व्यास 10
से 20 किलोमीटर का होगा तथा उनका तापमान कई अरब डिग्री सेंटीग्रेड हो जायेगा। अत्यधिक गुरुत्वीय
बल एवं तापमान के कारण तारे के भीतर के इलेक्ट्रान और प्रोटान एक दूसरे में विलीन होकर न्यूट्रॉन का
निर्माण कर देंगे और सम्पूर्ण तारा न्यूट्रॉन के गोले में तब्दील हो जायेगा। इस प्रकार बने न्यूट्रॉन तारे का
घनत्व इतना अधिक होगा कि उसके एक चम्मच पदार्थ का भार कई अरब किलोग्राम होगा। न्यूट्रॉन तारे
का संतुलन और आकार उसके गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न संकुचन और विकृत न्यूट्रॉन गैस
(degenerate neutron gas) के फैलाव द्वारा निर्धारित होता है।

                 
चित्र 4. पृथ्वी से 8.6 प्रकाश वर्ष दूर स्थित सिरियस तारों की हब्बल अंतरिक्ष टेलीस्कोप द्वारा ली गयी फोटो (बायें) और
सुब्रह्मण्यम चन्द्रशेखर की 1935 की फोटो (दायें)


         
चित्र 5. चित्रकार की कल्पना में न्युट्रान तारे के घूर्णन अक्ष (लाल रेखा) तथा चुम्बकीय अक्ष (हरा तीर) का प्रदर्शन जिससे
रेडियो तरंगें चुम्बकीय अक्ष की दिशा में प्रसारित होती हैं [बायीं ओर]। रोसलिन बेल की 1967 की फोटो जिन्होंने रेडियो
पल्सर के रूप में न्यूट्रान तारे की खोज किया [दायीं ओर]


सुपर-नोवा विस्फोट से न्यूट्रॉन तारे की उत्पत्ति होते ही वह अपनी अक्ष पर वैसे ही घूर्णन करने लगता
है जैसे पृथ्वी करती है। मगर न्युट्रान तारा अपनी अक्ष पर 1 सेकेंड में कई बार घूर्णन करता है जबकि
पृथ्वी 24 घण्टे में केवल एक बार करती है। न्यूट्रान तारे की सतह का तापमान करीब 6 लाख डिग्री
सेंटीग्रेड एवं चुम्बकीय क्षेत्र का मान पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से कई खरब गुना अधिक होता है। अगर
न्यूट्रान तारे का चुम्बकीय अक्ष उसके घूर्णन अक्ष से कोण बनाता है तो तारे के घूर्णन की वजह से रेडियो
तरंगें चुम्बकीय अक्ष की दिशा में उत्सर्जित होने लगती हैं (चित्र 5)। इन तरंगों का उदगम चुम्बकीय क्षेत्र के
उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों से होता है और वे चुम्बकीय अक्ष की दिशा में एक बिम्ब के रूप में आकाश का
चक्कर लगाती हैं। यदि पृथ्वी पर कोई स्थान इस रेडियो बिम्ब के मार्ग में पड़ता है तो एक खास निरन्तरता
के साथ कुछ क्षण के लिये वहां पर रेडियो संकेत मिलता है। रेडियो संकेत की यह निरन्तरता न्यूट्रान तारे
की घूर्णन की गति पर निर्भर करती है। क्योंकि यह रेडियो संकेत एक पल्स (pulse) या धड़कन के रूप
में मिलता है, इस प्रकार के तारे को पल्सर भी कहा जाता है। न्यूट्रान तारे की खोज रेडियो टेलीस्कोप द्वारा
1967 में  रोसलिन बेल नामक ब्रिटिश लड़की द्वारा की गयी (चित्र 5)। रोसलिन बेल कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी
में पी.एच-डी की पढाई कर रही थी और उसकी उम्र करीब वही थी जो सुब्रह्मण्यम चन्द्रशेखर की श्वेत
वामन तारे की उत्पत्ति का समीकरण देते समय थी। न्युट्रान तारे की खोज के बाद लोगों ने चंद्रशेखर के
सैद्धान्तिक अन्वेषण के महत्व को समझा और उन्हें 1983 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
यह भी खेद की बात है कि न्यूट्रॉन तारे की खोज के लिये 1974 में फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार रोसलिन
बेल के थीसिस पर्यवेक्षक एंथोनी हेविस और प्रख्यात खगोलविद मार्टिन राइल को प्रदान किया गया।
यद्यपि पल्सर की खोज में रोसलिन बेल की  महत्वपूर्ण भूमिका थी और नोबेल पुरस्कार एक साथ
अधिकतम 3 लोगो को दी जा सकती है मगर रोसलिन इससे वंचित रह गयी।

यदि कोई तारा सूर्य के तीन गुने से अधिक भारी हो तो सुपर-नोवा विस्फ़ोट के बाद वह श्याम
विवर (black hole) में तब्दील हो जाता है। श्याम-विवर या ब्लैक होल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अपरम्पार
होती है। ये ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले ऐसे दानव हैं जो अपने आसपास आने वाले हरेक प्रकार के
पदार्थ और ऊर्जा को निगलते रहते हैं। इनकी भूख अंतहीन है, जितना निगलते हैं उनकी भूख उतनी ही
अधिक बढ़ती जाती है। अभी तक ब्रह्माण्ड में उपस्थित किसी पिण्ड के बारे में हमारी जानकारी का स्रोत
उस पिण्ड से निकलने वाला दृश्य एवं अदृश्य प्रकाश रहा है। पृथ्वी पर स्थित या अंतरिक्ष में उपग्रहों पर
स्थित अत्यंत शक्तिशाली टेलीस्कोप द्वारा हम किसी भी आकाशीय पिण्ड से निकलने वाली प्रकाश की
किरणों के अलावा अदृश्य एक्सरे किरणों, अल्ट्रावायलेट किरणो, इन्फ्रारेड किरणों तथा रेडियो किरणों द्वारा
उस पिण्ड का अवलोकन करने में समर्थ हैं। मगर श्याम-विवर (ब्लैक होल) अत्यंत रोचक और विचित्र
पिण्ड है। इसका गुरुत्वाकर्षण बल इतना शक्तिशाली होता है कि प्रकाश भी विवर से बाहर नही निकल
पाता। ऐसी स्थिति में इनका तारों की तरह प्रत्यक्ष अवलोकन नही किया जा सकता है। इनके बारे में अभी
तक केवल अप्रत्यक्ष प्रमाण ही मिले थे। जब कोई बहुत बड़ा तारा श्याम-विवर के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की
जद में आ जाता है तो यह दानव  नोच नोच कर उसका पदार्थ अपने मे समाहित करने लगता है। तारे से
नोचा गया पदार्थ विवर में घुसने के पहले घर्षण से उत्पन्न गर्मी के कारण एक्सरे किरणें उत्सर्जित करने
लगता है जिसे अंतरिक्ष मे स्थित एक्सरे टेलिस्कोप से देखा जा सकता है जैसा चित्र 6 में प्रदर्शित है।
श्याम-विवर के भयानक गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में अपना अस्तित्व खोते हुये तारे द्वारा एक्सरे किरणों के
उत्सर्जन की तुलना शेर के रूप में साक्षात मृत्यु को सामने देखकर हिरन की चीत्कार से की जा सकती है।
वास्तव में ब्लैक होल ब्रह्मांड में अत्यंत विनाशकारी घटनाओं को अंजाम देते हैं।

                
चित्र 6. चित्रकार की कल्पना में एक विशालकाय तारे (बायें) को अपने गुरुत्वाकर्षण द्वारा क्रमशः निगलता हुआ ब्लैक होल
(दायें)


गुरुत्वाकर्षण क्या है


एक किवदंती के अनुसार जब महान वैज्ञानिक आइजेक न्यूटन अपने बगीचे में बैठे हुए प्रकृति के बलों के
बारे में चिंतन कर् रहे थे तो अचानक पेड़ से उन्होंने सेव का फल जमीन पर गिरते देखा (चित्र 7)। इस
घटना के समाधान के लिये उन्होंने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की परिकल्पना की। सन 1687 में न्यूटन ने
“Principia Mathematica” नामक पुस्तक में गति के तीन नियमो के साथ सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण बल
का उल्लेख किया है। किसी भी दो आकाशीय पिण्डों के बीच गुरुत्वाकर्षण का बल ‘F’ निम्नलिखित
समीकरण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है:
    F = G m1m2/r2                                                                   (1)
जिसमे G को सार्वभौमिक या सार्वत्रिक गुरुत्वीय नियतांक (universal gravitational constant)
कहते हैं तथा m1 और m2 क्रमशः दोनों पिण्डों में पदार्थ की मात्रा या द्रव्यमान हैं और r उनके बीच की दूरी
है। गुरुत्वाकर्षण का बल विद्युतीय या चुम्बकीय बल की अपेक्षा अत्यंत क्षीण होता है। दो विद्युतीय आवेश
वाले कणों के बीच का विद्युतीय बल ‘F’ कुलम्ब के नियमानुसार (Coulomb’s law) निम्नलिखित
समीकरण से व्यक्त किया जाता है:
      F = q1q2/r2                                                                           (2)
जिसमे q1 और q2 क्रमशः दोनो कणों का विद्युत आवेश एवं r उनके बीच की दूरी है।

              
चित्र 7. आइजेक न्यूटन ने सेव के पेड़ से जमीन पर गिरते फल को देखकर सन 1687 में पदार्थ के दो पिण्डों के बीच
गुरुत्वाकर्षण बल की परिभाषा दिया। अल्बर्ट आइंस्टीन ने सन 1916 में सापेक्षता के सिद्धांत के आधार पर गुरुत्वाकर्षण
की उत्पत्ति को काल-अंतराल (spacetime) के मोड़ या वक्रता के रूप में प्रतिपादित किया।


  गुरुत्वाकर्षण बल की क्षीणता का अनुमान लगाने के लिये हाइड्रोजन का परमाणु एक सहज उदाहरण है।
हाइड्रोजन के परमाणु में स्थित इलेक्ट्रान एवं प्रोटान के बीच की दूरी 0.5x10-10 मीटर होती है। इन
प्राथमिक कणों (elementary particles) के द्रव्यमान और  विद्युतीय आवेश को संज्ञान में लेने पर
समीकरण (1) और (2) द्वारा यह देखा जा सकता है कि उनके बीच का गुरुत्वाकर्षण बल उनके बीच के
विद्युतीय बल का केवल 10-40 अंश ही होगा।
यद्यपि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण बल की गणना का नियम प्रतिपादित किया जिससे सौर मंडल में पृथ्वी
तथा अन्य ग्रहों एवं उपग्रहों की कक्षा एवं गति को भलीभांति समझा जा सका मगर उन्होंने गुरुत्वीय बल
की उत्पत्ति के बारे में कोई जानकारी नही दिया। आइंस्टीन ने 1905 में विशेष सापेक्षता सिद्धान्त द्वारा दो
बातो कों स्पष्ट किया था। पहला कि कोई भी संकेत एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रकाश की गति से
अधिक तेजी से नही भेजा जा सकता है। और दूसरा कि पदार्थ के द्रव्यमान को ऊर्जा में परिवर्तित किया
जा सकता है, अतः द्रव्यमान और ऊर्जा एक ही चीज हैं। न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण की परिकल्पना के
अनुसार दो आकाशीय पिण्डों के बीच गुरुत्वीय बल तत्काल एक दूसरे को प्रभावित करने लगता है, चाहे
वे दोनों पिण्ड किसी भी दूरी पर स्थित हों। न्यूटन की इस परिकल्पना को दूरी की कार्रवाई
(action at a distance) का सिद्धांत कहते हैं। हम यह जानते हैं कि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुंचने
में करीब 8 मिनट का समय लगता है। अगर हम कल्पना करें कि सूर्य आकाश से अचानक गायब हो जाय
तो इस घटना की जानकारी पृथ्वी पर 8 मिनट बाद होगी। इस काल्पनिक घटना के आधार पर आइंस्टाइन
ने 300 वर्षों में पहली बार न्यूटन के दूरी की कार्रवाई के सिद्धांत को गलत बताया तथा गुरुत्वाकर्षण की
उत्पत्ति और मूल के बारे में बिलकुल नवीन दृष्टिकोण से सोचना शुरू कर दिया।
                         
चित्र 8. पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव में एक कृत्रिम उपग्रह की कक्षा का निर्धारण आइंस्टीन की काल-अंतराल चादर की विकृति
(distortion in spacetime fabric) द्वारा होता है।    
आइंस्टीन ने 1916 में सामान्य सापेक्षता के सिद्धान्त (General Relativity) के आधार पर
गुरुत्वीय बल की उत्पत्ति को ज्यामितीय रूप में परिभाषित किया। इस परिभाषा के अनुसार किसी
आकाशीय पिंड के द्रव्यमान द्वारा उसके इर्द गिर्द के अंतरिक्ष में विकृति उत्पन्न होती है जिसकी गहराई या
वक्रता (curvature) उस पिण्ड के द्रव्यमान के समानुपाती होती है। आइंस्टीन के काल-अंतराल
(spacetime) की इस विकृति की गणित अत्यधिक कठिन है मगर इसे एक उदाहरण द्वारा समझा जा
सकता है। कल्पना कीजिये कि किसी बेलनाकार बर्तन के बहुत बड़े व्यास के गोलाकार मुख पर एक रबर
की चादर तानकर बांध दी गयी है जो देखने पर सपाट लगती है। अगर समान आकार की एक लोहे और
दूसरी लकड़ी की गेंद रबर की चादर पर अलग अलग जगह रख दी जाये तो अब चादर सपाट नही दिखेगी।
लोहे की गेंद के इर्द गिर्द एक गहरा गढ्ढा और लकड़ी की गेंद के इर्दगिर्द एक छिछला गढ्ढा बन जायेगा। इन
गढ्ढो की गहराई लोहे तथा लकड़ी की गेंदों के गुरुत्वीय बल को प्रदर्शित करती हैं जो उनके द्रव्यमान के
अनुपात में होता है। चित्र 8 में पृथ्वी  द्वारा काल-अंतराल में उतपन्न वक्रता दिखाई गई है जिसके प्रभाव में
कृत्रिम उपग्रह पृथ्वी के चारो ओर अपनी कक्षा में चक्कर लगाता है। इसी प्रकार हमारे सौर मंडल में सूर्य के
गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न वक्रता में फंस कर सभी ग्रह अपनी अपनी कक्षा में सूर्य का चक्कर लगाते
हैं और प्रत्येक ग्रह के चंद्रमा उस ग्रह के चक्कर लगाते हैं।
श्याम विवर का गुरुत्वीय प्रभाव सूर्य की अपेक्षा अरबों गुना अधिक होता है और इसी कारण वे
अपने इर्द गिर्द के तारों को अपने मे समाहित कर लेते हैं जैसा चित्र 6 में दिखाया गया है। अति साधारण
भाषा में आइंस्टीन की इस गूढ़ विवेचना को यूँ कहा जा सकता है कि आकाशीय पिंड का द्रव्यमान अंतरिक्ष
में वक्रता पैदा कर देता है और फिर यह वक्रता निर्धारित करती है कि उस पिंड के इर्दगिर्द अन्य आकाशीय
पिंड अंतरिक्ष मे कैसे भ्रमण करेगा।  न्यूटन के अनुसार दो पिंडो के बीच गुरुत्वाकर्षण बल तत्काल प्रभाव
से काम करता है जबकि आइंस्टीन के अनुसार यह बल प्रकाश की गति से दो पिण्डों को प्रभावित करता
है।


श्याम विवर और गुरुत्वीय तरंगें


कैल्फोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर किप थॉर्न का जीवन श्याम विवर और न्यूट्रॉन तारों के
रहस्यों की जानकारी में बहुत अंतरंगता से जुड़ा है। उनकी 1994 में लिखी किताब ‘श्याम विवर और
काल्पनिक समय’ (Black Holes & Time Warps) के बारे में स्वर्गीय स्टीफन हॉकिंग ने लिखा है,
“ यह पुस्तक एक भावी वैज्ञानिक खोज का इतिहास है जो जेम्स वॉटसन की पुस्तक ‘डबल हेलिक्स’
(Double Helix) की तरह है जिसमें DNA की खोज का वर्णन है। DNA की खोज से आनुवंशिकी के
क्षेत्र में बहुत प्रगति हुई। लेकिन DNA के विपरीत श्याम विवर के बारे में कोई परीक्षण की जानकारी नही
थी। वास्तव में श्याम विवर के बारे में किसी परीक्षण द्वारा जानकारी मिलने के पहले ही उनकी सैद्धान्तिक
जानकारी में प्रोफेसर किप थॉर्न के द्वारा अकल्पनीय विकास हुआ है।” गुरुत्वीय तरंगों की खोज में
कम्प्यूटर मॉडल का बहुत महत्व है जिसके द्वारा इन तरंगों की आकृति का पता लगता है। गुरुत्वीय तरंग
की आकृति बनाने में श्याम विवर या न्यूट्रॉन तारे की भौतिक जानकारी जरूरी होती है तथा सापेक्षता
(Relativity) के अत्यधिक क्लिष्ट समीकरणों को घण्टो तक कम्प्यूटर की मदद से हल करना पड़ता है ।  
ब्रह्माण्ड में श्याम विवर अति भयानक शक्ति का गुरुत्वीय क्षेत्र होता है जैसा चित्र 9 के कम्प्यूटर मॉडल से
स्पष्ट है। इस चित्र को देखकर मुझे अपने बचपन की 1948 में गंगा की भीषण बाढ़ से हमारे गांव के
आसपास की तबाही का ख्याल आता है। बाढ़ के उफनते हुए जल में जगह जगह भीषण चकोह (चित्र 9)
की चपेट में आकर आदमी तथा जानवर वैसे ही लुप्त हो जाते थे जैसे श्याम विवर की चपेट में आनेवाले
तारे विलुप्त हो जाते हैं।
आइंस्टीन की जनरल रिलेटिविटी सिद्धान्त के अनुसार जब कोई  भारी आकाशीय पिंड बहुत
त्वरित गति से चलायमान होता है तो काल-अंतराल की चादर में गुरुत्वीय तरंगें उत्पन्न होती हैं। यद्यपि
काल-अंतराल की चादर को चित्र 8 के माध्यम से दिखाने की कोशिश की गयी है लेकिन यह याद रखना
होगा कि काल-अंतराल (spacetime) एक क्लिष्ट गणितीय कल्पना है जिसे भौतिक रूप में नही देखा
जा सकता है। जैसे हम हवा को अपनी आंख से नही देख सकते मगर यह जानते हैं कि जब कोई आवाज
हमारे कान तक पहुंचती है तो वह स्रोत से हमारे पास तक तरँग के रूप में आने के दौरान हवा में विकृति
उतपन्न करती है। इसी प्रकार हम कल्पना कर सकते हैं कि गुरुत्वीय तरंगें अंतरिक्ष के एक भाग से दूसरे
भाग तक चलने में काल-अंतराल में विकृति उतपन्न करती हैं। जबकि ध्वनि की तरंगें या प्रकाश की तरंगें
बीच मे किसी भारी द्रव्यमान वाले पिण्ड के आ जाने से अवरोधित हो जाती हैं, गुरुत्वीय तरंगें भारी से
भारी आकाशीय पिण्ड के बीच से बिना किसी अवरोध के निकल जाती हैं। कम्प्यूटर मॉडल के द्वारा यह
जानकारी मिलती है कि जब दो भारी भरकम श्याम विवर एक दूसरे से सूर्य के व्यास की पांच गुनी दूरी पर
होते हैं तो गुरुत्वाकर्षण की वजह वे बड़ी तेजी से एक दूसरे का चक्कर लगाने लगते हैं।इस तरह के दो
श्याम विवर को युग्मक (binary) श्याम विवर या युग्मक ब्लैक होल कहते हैं। इस प्रक्रिया में वे एक दूसरे
के नजदीक आने लगते हैं तथा उनकी गति प्रकाश की गति के करीब होने लगती है और अंत में वे एक
दूसरे से मिलकर बहुत भारी श्याम विवर बना देते हैं। इस नये श्याम विवर का द्रव्यमान दोनो श्याम विवरों
के द्रव्यमान से थोड़ा कम होता है क्योंकि बाकी द्रव्यमान ऊर्जा में तब्दील होकर गुरुत्वीय तरंगों के रूप में
ब्रह्माण्ड में प्रसारित हो जाता है।


 
चित्र 9. श्याम विवर का कम्प्यूटर जनित मॉडल जिसके केंद्र में सर्वाधिक गुरुत्वीय बल है (बायें) तथा गंगा नदी की भीषण
बाढ़ में उत्पन्न चकोह (दायें)


प्रोफेसर किप थॉर्न के सहयोगियों द्वारा गुरुत्वीय तरंगों के उत्पन्न होने की यह प्रक्रिया चित्र 10
द्वारा बायें से दायें की ओर प्रदर्शित की गयी है। शुरू में तरंग की आवृति कम रहती है और जैसे जैसे दोनो
श्याम विवर एक दूसरे के नजदीक आते हैं तरंग की आवृति तथा ऊर्जा तेजी से बढ़कर उनके एकीकृत होते
समय अधिकतम हो जाती है। नये श्याम विवर के बनते ही उसके द्वारा उत्सर्जित गुरुत्वीय तरंग की ऊर्जा
तेजी के साथ शून्य हो जाती है। युग्मक श्याम विवरों के विलयन की घटना को 3 मुख्य अवस्थाओं में बांटा
जा सकता है। चक्रमण (inspiral) की अवस्था मेँ दोनों श्याम विवर अलग दिखते हैं, विलयन (merger)
की अवस्था में दोनों एकीकृत हो जाते हैं और शांत (ring down) अवस्था में गुरुत्वीय तरंग का प्रसारण
तेजी से समाप्त हो जाता है। युग्मक श्याम विवर के विलयन और शांत होने की स्तिथि से उत्पन्न होने वाली
गुरुत्वीय तरंगों की कल्पना किचन में पट्टे पर से फर्श पर गिरने वाली थाली से निकलने वाली झंकार से की
जा सकती है।


चित्र 10. दो श्याम विवर के टक्कर द्वारा मिलकर एक बड़ा श्याम विवर बनने की प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाली गुरुत्वीय तरंगें
(बायें) तथा इन तरंगों के आकार की कम्प्यूटर द्वारा गणना के जनक प्रोफेसर किप थॉर्न की 1972 की फोटो (दायें)

विद्युत-चुम्बकीय तरंगों की तरह गुरुत्वीय तरंगें भी अनुप्रस्थ होती हैं मगर विद्युत-चुम्बकीय तरंग के
एक रेखीय ध्रुवण की जगह इनमें  + तथा x द्वारा प्रदर्शित दो ध्रुवण होते हैं जैसा चित्र 11 के ऊपरी भाग में
दिखाया गया है। जब गुरुत्वीय तरँग किसी पदार्थ से बनी अत्यंत पतली वृत्ताकार वलय
(very thin circular ring) की सतह के लम्बवत पड़ती है तो वलय में कम्पन उत्पन्न हो जाता है जिसकी
आवृत्ति गुरुत्वीय तरँग की आवृत्ति के बराबर होती है। इस कम्पन के दौरान वलय की आकृति वृत
(circle) और दीर्घ वृत (ellipse) के बीच दोलन करने लगती है। वृताकार वलय के इस सामयिक
(periodic) आकार परिवर्तन को इस रूप में भी समझाया जा सकता है कि वृत के दो परस्पर लम्बवत
व्यास में से जब एक बड़ा होता है उस समय दूसरा छोटा होता है।
वृताकार वलय की सतह के लम्बवत पड़ने वाली गुरुत्वीय तरँग द्वारा उसके आकर परिवर्तन की प्रक्रिया को
और स्पष्ट रूप से समझने के लिए चित्र 11 के निचले भाग का उपयोग किया जा सकता है। इसमें
गुरुत्वीय तरंग के एक काल (period T) में वृत्ताकार वलय में होने वाले परिवर्तन को दिखाया गया है।
चित्र में बिल्कुल बायीं और जब तरंग का आयाम (amplitude) शून्य है तो वृत के आकार में कोई
परिवर्तन नही है मगर T/4 समय बाद जब तरंग का आयाम धनात्मक दिशा में अधिकतम हो जाता है तो
वृत विकृत होकर दीर्घ वृत बन जाता है जिसका दीर्घ अक्ष उर्ध्वाधर दिशा में और लघु अक्ष क्षैतिज दिशा में
है। T/2 समय के बाद तरंग का आयाम शून्य हो जाता है और वृत्त अपनी पूर्व अवस्था मे आ जाता है।
3T/4 समय के बाद तरंग का आयाम ऋणात्मक दिशा में अधिकतम होने पर वृत्त पुनः विकृत होकर दीर्घ
वृत बन जाता है मगर इस बार उसका दीर्घ अक्ष क्षैतिज दिशा में और लघु अक्ष उर्ध्वाधर दिशा में होता है।
अंत मे T समय बाद तरंग का आयाम शून्य होने पर वृत्त  अपने पुराने आकार में आ जाता है। इस प्रकार
हम देखते हैं कि गुरुत्वीय तरंग द्वारा अधिकतम परिवर्तन वृत के दो परस्पर लम्बवत व्यास की लंबाई में
होता है। जब वृत का एक व्यास तरंग के प्रभाव में फैलकर लम्बा हो जाता है तो लम्बवत दिशा वाला व्यास
सिकुड़ कर छोटा हो जाता है। दो परस्पर लम्बवत दिशाओं में से एक कि लम्बाई का बढ़ना और दूसरी की
लंबाई का उसी अनुपात में कम हो जाना गुरुत्वीय तरंगों द्वारा आकार परिवर्तन की विशेषता है जिसका
उपयोग गुरुत्वीय तरंग की खोज में किया जाता है।


              
                         
चित्र 11.  विद्युतचुम्बकीय तरंग में विद्युत क्षेत्र का एक रेखीय ध्रुवण (ऊपर बायीं ओर) तथा चित्र के पेज के लम्बवत प्रसारित
होने वाली गुरुत्वीय तरंग में दो प्रकार के ध्रुवण (+ एवं x) । गुरुत्वीय तरंग के एक काल T के दौरान वृताकार वलय के आकार
में होने वाले परिवर्तन (नीचे)


लेजर इंटरफेरोमीटर द्वारा गुरुत्वीय तरंग का मापन


महान भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट माइकेलसन ने 1887 में अपने सहयोगी प्रोफेसर मोरले के साथ प्रकाश
आधारित अपने प्रयोगों  से इस भ्रांति को दूर कर् दिया कि ब्रह्मांड की खाली जगह ईथर नामक एक अदृश्य
पदार्थ से भरी हुई है। इस प्रयोग में उन्होंने जिस उपकरण का उपयोग किया था वह अब उनके नाम से
जाना जाता है तथा चित्र 12 में दिखाया गया है। माइकेलसन इंटरफेरोमीटर
(Michelson interferometer)  में एकवर्णी प्रकाश शीशे की एक ऐसी पट्टी (beam splitter) पर
पड़ता है जिसके द्वारा आधी चमक की किरण वर्तन के बाद सीधे निकल जाती है और आधी चमक की
किरण लम्बवत दिशा में परावर्तित हो जाती है। प्रकाश की मुख्य किरण के विभाजन से उत्पन्न परस्पर
लम्बवत दिशा में जाने वाली दोनो किरणे दो अलग अलग दर्पणों पर लम्बवत पड़ती हैं जैसा चित्र 12 में
दिखाया गया है। अंत के दर्पणों से परावर्तन के बाद दोनो किरणें बीच के शीशे की पट्टी के पास एक दूसरे
से मिलकर व्यतिकरण (interference) द्वारा फ्रिंजे बनाती हैं जिनका अवलोकन टूटी हुई रेखा की दिशा
में टेलीस्कोप द्वारा  किया जा सकता है। माइकेलसन के शुरू में बनाये गये इंटरफेरोमीटर में बीच वाली
शीशे की पट्टी से प्रत्येक दर्पण की दूरी करीब 1 मीटर की थी। माइकेलसन ने अपने उपकरण की
संवेदनशीलता बढ़ाने के लिये कई दर्पण लगाकर बीच वाली शीशे की पट्टी पर मिलने के पहले दोनों किरणों
द्वारा तय की गई दूरी 1 मीटर से बढ़ाकर 11 मीटर कर् दिया जो चित्र 13 द्वारा प्रदर्शित है।


      
चित्र 12. माइकेलसन इंटरफेरोमीटर की मूलभूत रूपरेखा: लेजर स्रोत से एकवर्णी प्रकाश की किरण बीच की पट्टी
(beam splitter) पर पड़ने के बाद दो परस्पर लम्बवत भागों में बंट जाती है। आधी चमक वाली किरण अपनी पूर्ववत
दिशा में चलती हुई अंत के दर्पण पर लम्बवत पड़ती है। आधी चमक वाली दूसरी किरण पहली किरण के लम्बवत चलती
हुई दूसरे दर्पण की सतह पर लम्बवत पड़ती है। दोनो दर्पणों से परावर्तित होने के बाद किरणें उल्टी दिशा में चलती हुई पुनः
शीशे की पट्टी के पास  मिलकर व्यतिकरण उत्पन्न करती हैं जिसे टूटी रेखा की दिशा में देखा जा सकता हैं।
      
चित्र 13. प्रोफेसर माइकेलसन (बायीं ओर), टेलिस्कोप में दिखने वाली फ्रिंज (दायीं ओर) तथा संवेदनशील इंटरफेरोमीटर
(बीच में) जिसमे प्रकाश स्रोत ‘a’ बीच वाली शीशे की पट्टी ‘b’ तथा टेलिस्कोप ‘f’ से प्रदर्शित है।


प्रोफेसर माइकेलसन ने अपने प्रयोग में  श्वेत प्रकाश का उपयोग किया था जिससे टेलीस्कोप में प्रकाश के
व्यतिकरण (interference) से उत्पन्न पतली फ्रिंजे काली के अलावा सफेद तथा रंगीन दिखती हैं। इन
फ्रिंजो का मापन टेलिस्कोप में लगे क्रॉस वायर की मदद से बहुत संवेदनशीलता के साथ किया जा सकता
था। पृथ्वी के ईथर के बीच से गुजरने पर यह अनुमान लगाया गया था कि बीच की सफेद फ्रिंज अपने
स्थान से फ्रिंज की मोटाई के 0.4 अंश तक हट जायेगी। अनेक बार प्रयोग को दोहराने के बाद भी फ्रिंज
की स्थिति में इस प्रकार का कोई परिवर्तन नही देखा जा सका था। माइकेलसन के प्रयोग द्वारा ईथर का न
होना सिद्ध होता है जिसको उस समय के वैज्ञानिकों ने सन्देह की दृष्टि से देखा। जब आइंस्टीन ने 1905
के अपने विशेष सापेक्षता सिद्धान्त के लिए निर्वात में प्रकाश की गति को एक नियतांक की संज्ञा दिया तब
लोगों को माइकेलसन के ऐतिहासिक प्रयोग की महत्ता का ज्ञान हुआ और उन्हें 1907 के भौतिकी में
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
लीगो (LIGO) नामक जिस उपकरण का उपयोग गुरुत्वीय तरंगों के मापन के लिये किया गया है
वह माईकेलसन इंटरफेरोमीटर का ही अत्यधिक परिष्कृत रूप है। इस उपकरण में बीच (junction) की
शीशे की पट्टी से प्रत्येक किनारे के दर्पण की दूरी 4 किलोमीटर है तथा इसकी संवेदनशीलता बढ़ाने के लिये
कुछ और दर्पण (Fabry-Perot mirrors) लगाकर इसे 1100 किलोमीटर तक बढ़ा दिया गया है।
जैसा ऊपर बताया गया है, माइकेलसन के प्रयोग की संवेदनशीलता इतनी अविश्वसनीय थी कि बहुत से
तत्कालीन वैज्ञानिक उस पर संदेह करते थे। जब 1905 में आइंस्टीन ने स्पेशल रिलेटिविटी में प्रकाश की
गति को एक मौलिक नियतांक मान लिया तब माइकेलसन के लिये नोबेल पुरस्कार का मार्ग प्रशस्त हुआ।
यह एक सुखद संयोग है कि आइंस्टीन के गुरुत्वीय तरंगों की परिकल्पना के 100 वर्ष बाद माइकेलसन के
उपकरण द्वारा ही इन तरंगों की खोज संभव हो सकी है जो पुनः 2017 में नोबेल पुरस्कार का आधार
बना है।


लेजर इंटरफेरोमीटर वेधशाला LIGO में ब्रह्मांड की आवाज




चित्र 14. अमेरिका में 3000 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैमिल्टन एवं लिविंगस्टन की LIGO वेधशालाएं (ऊपर बायीं ओर)
, इन्टरफेरोमीटर की परस्पर लम्बवत 4 किलोमीटर लंबी भुजाओं का जंक्शन (ऊपर दायीं ओर), दो एक समान मगर् एक
दूसरे की विपरीत दिशा में आरोपित विशालकाय इंटरफेरोमीटर के हवाई चित्र में हैमिल्टन का LIGO (नीचे बायीं ओर) तथा
लिविंगस्टन का LIGO (नीचे दायीं ओर)

हम बता चुके हैं कि माइकेलसन इंटरफेरोमीटर की दो भुजायें परस्पर लम्बवत दिशा में होती हैं।
हम यह भी देख चुके हैं कि किसी वृताकार वलय की सतह पर लम्बवत प्रहार करने वाली गुरुत्वीय तरँग
द्वारा उसमें ऐसा कम्पन उत्पन्न होता है कि जब उसके एक व्यास की लंबाई बढ़ती है तो उसके लम्बवत
व्यास की लंबाई घट जाती है (चित्र 11)। हम यह भी जानते हैं कि गुरुत्वीय तरँग का बल अति क्षीण होता
है और अगर उसके द्वारा L लम्बाई में dL की घटोत्तरी या बढ़ोतरी होती है तो उसे निम्नलिखित समीकरण
द्वारा व्यक्त किया जाता है:
                            dL/L = s     या         dL = sL                        (3)
जिसमें गुरुत्वीय तरँग जनित तनाव s का मान 10-21 है।

1970 के पूर्वार्द्ध में अमेरिका स्थित MIT के प्रोफेसर रेनर वाइस ने सर्वप्रथम यह विचार व्यक्त किया
कि यद्यपि परस्पर लम्बवत भुजाओं वाला माइकलसन इंटरफेरोमीटर गुरुत्वीय तरँग के मापन का सबसे
उपयुक्त उपकरण है मगर उसकी संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए अत्यधिक लम्बी भुजाओं की आवश्यकता
होगी। अगर यह मान लिया जाय कि गुरुत्वीय तरँग की आवृत्ति 100 Hz है तो समीकरण (3) में dL के
सफलता पूर्वक मापन के लिये L को 700 किलोमीटर होना चाहिए, जो अव्यवहारिक है। सन 1994 में
कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर बैरी बारीस ने LIGO के निर्माण की जिम्मेदारी
संभाली और उन्होंने विशेषज्ञों की एक बहुत बड़ी टीम तैयार किया जिसमें भौतिकविद, खगोलविद,
इंजीनियर, कम्प्यूटर तथा स्टेटिस्टिक्स के जानकार सम्मिलित थे। 4 किलोमीटर लंबी भुजाओं वाले
इंटरफेरोमीटर का निर्माण भी एक बहुत बड़ी चुनौती थी क्योंकि पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण इतनी
दूरी में उसके सतह की समतलता में 1 मीटर का अंतर था। इस निर्माण में कंक्रीट की ढलाई इतनी बारीकी
से करनी थी कि 1.2 मीटर व्यास वाली वायुरहित स्टील की 4 किलोमीटर लम्बी ट्यूब एकदम सपाट रूप
में स्थिर की जा सकें। इस काम में जरा सी चूक होने पर इंटरफेरोमीटर की दोनो भुजाओं के जंक्शन से
चलने वाली लेजर बिम्ब किनारे पर लगे दोनो दर्पणों से 1 मीटर ऊपर टकरातीं। दोनो स्टील ट्यूब के भीतर
अतिशय निर्वात की स्थिति बनाये रखने के लिए हवा का दबाव 10-9 torr से कम रखना आवश्यक था।
इस काम के लिये 10 हजार घन मीटर हवा को निकालने में 1100 घण्टे अति शक्तिशाली पम्प चलाने पड़े
जिसमें 40 दिन का समय लगा था। भीतर निर्वात की स्थिति में बाहर की हवा के भारी दबाव को सहन
करने के लिये विशेष प्रकार के स्टील से बनायी गई ट्यूबों की मोटाई केवल 3 मिलीमीटर है। चित्र 14 में
प्रदर्शित दोनो इंटरफेरोमीटर की बनावट ऐसी है कि वे 10 Hz से लेकर 10000 Hz आवृत्ति वाले किसी
भी गुरुत्वीय तरँग की जानकारी दे सकते हैं।
अमेरिका के उत्तर-पश्चिम में स्थित हैन्फोर्ड के इंटरफेरोमीटर की एक भुजा जंक्शन से निकलकर
उत्तर दिशा से करीब 37o पश्चिम की ओर झुकी है। इसी प्रकार अमेरिका के दक्षिण-पूर्व में स्थित
लिविंगस्टन के इंटरफेरोमीटर की एक भुजा जंक्शन से निकलकर दक्षिण दिशा से करीब 18o पूरब की
ओर झुकी है। जैसा चित्र 14 के निचले भाग में दोनों स्थानों के इंटरफेरोमीटर की स्थिति से स्पष्ट है कि वे
एक दूसरे के तरफ पीठ किये हुए एक दूसरे की विपरीत दिशा में निरीक्षण के लिये 3000 किलोमीटर की
दूरी पर स्थापित किये गये हैं। दोनो इंटरफेरोमीटर का यह उन्मुखीकरण इस लिये किया गया है कि आकाश
के किसी भी भाग में दो भारी पिण्डों के बीच होने वाली भीषण टक्कर से उत्पन्न गुरुत्वीय तरँग का कुछ
भाग एक इंटरफेरोमीटर अंकित करेगा और कुछ भाग दूसरा अंकित करेगा। इसको 360o दृष्टि की संज्ञा
भी दी जा सकती है।
LIGO के 360o दृष्टि की जानकारी के बाद मुझे अपने छात्र जीवन की एक बड़ी मनोरंजक घटना
याद आ गयी। 1960 के दशक में मैं साइंस कॉलेज का छात्र था और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के ब्रोचा
हॉस्टल में रहता था। उस समय यूनिवर्सिटी बनारस शहर से बाहर दक्षिणी छोर पर थी और सबसे नजदीक
का मार्केट लंका में था। छात्रों के हॉस्टल के सामने से होकर लंका को जाने  वाली सड़क है जिसके करीब
अन्तिम छोर पर इंजीनियरिंग छात्रों के हॉस्टल थे। प्रायः इंजीनियरिंग के प्रत्येक छात्र के पास साइकिल
हुआ करती थी जो साइंस और आर्ट्स के छात्रों को सुलभ नही थी। अक्सर शाम को इंजीनियरिंग छात्रों
का झुंड साइकिल पर लंका से लौटते समय बिरला और ब्रोचा हॉस्टल में रहने वाले छात्रों का उपहास करते
हुए तेजी से निकल जाया करता था। ब्रोचा के दो स्मार्ट छात्रों ने इस उपहास से बचने का एक अनोखा
तरीका अपनाया। इन लोगों ने एक अति जीर्ण शीर्ण साइकिल का इंतजाम किया और ब्रोचा हॉस्टल के उस
सिरे पर इंतजार करने लगे जो बिरला हॉस्टल की तरफ है। जब इंजीनियरिंग छात्रों का साइकिल सवार
झुंड बिरला वालों को अपमानित करते हुए दिखाई पड़ा तो एक स्मार्ट छात्र साइकिल चलाने लगा और
दूसरा पीछे वाली सीट पर पीछे की ओर मुंह करके बैठ गया। जीर्ण शीर्ण साइकिल अति धीमी रफ्तार से
लहराती हुई, तेजी से आने वाले झुंड के आगे अग्रसर हो गयी। जब झुंड के लोग दायीं ओर से ओवरटेक
करने की कोशिश करते तो पीछे बैठे अपने साथी के कहने पर उसका स्मार्ट साथी अपनी लहराती हुई
साइकिल को दायीं ओर मोड़ देता और जब पीछे का झुंड बायीं ओर से ओवरटेक करना चाहता तो मन्थर
गति की साइकिल बायीं ओर मोड़ दी जाती। इसका नतीजा हुआ कि 20-25 मीटर चलने के बाद झुंड के
ज्यादातर साइकिल सवार धराशायी हो गये। दो या तीन दिन यह उपक्रम करने के बाद इंजीनियरिंग के छात्र
शालीनता के साथ हॉस्टल रोड से जाने लगे और बिरला तथा ब्रोचा हॉस्टल के छात्रों को उनके उपहास से
निजात मिली। इस घटना की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि हॉस्टल रोड बहुत व्यस्त मार्ग था जिस पर बिना
किसी डिवाइडर के दोनों ओर ट्रैफिक चलती थी। चूंकि आगे वाला स्मार्ट छात्र अपने आगे 180o दृष्टि
रखता था और पीछे वाला पीछे की ओर 180o तक देखता था अतः यह उपक्रम 360o दृष्टि का एक
अनोखा उदाहरण था। मैंने इंटरनेट पर अपने पूर्व के स्मार्ट साथियों की तर्ज पर एक साइकिल पर दो सवार
ढूढंने की बहुत कोशिश की मगर जो मिला वह चित्र 15 में प्रदर्शित है। यह एक विशेष प्रकार की गियर
वाली साइकिल है जिसमें दोनो चालक विपरीत दिशा में चलाते दिखते हैं लेकिन साइकिल एक ही दिशा में
अग्रसर रहती है।
                             
चित्र 15. सड़क पर 360o दृष्टि का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिये विशेष प्रकार की गियर वाली साइकिल जो दोनों चालकों
के चलाने पर एक ही तरफ चलती है।


    
चित्र 16.  हैन्फोर्ड के LIGO में गुरुत्वीय तरँग जनित तनाव का संकेत (ऊपर बायीं ओर) लिविंगस्टन के LIGO में देखे गए
संकेत (ऊपर दायीं ओर) के 6.9 मिली सेकेंड बाद पहुंचा था। चित्र की दूसरी पंक्ति मे उपरोक्त संकेतों की व्याख्या के लिये
कम्प्यूटर जनित तरँग के आकार तथा उससे निचली पंक्ति में LIGO के संकेतों में शोर (noise) का अनुपात दिखाया गया है।
सबसे नीचे की पंक्ति में 0.2 सेकेंड के दौरान गुरुत्वीय तरँग के संकेत की आवृति एवं आयाम में समय के साथ होने वाले
परिवर्तन के कारण चिड़िया की चहक (चूँ चूँ) जैसी आवाज निकलती है।


14 सितम्बर 2015 को LIGO के जुड़वाँ इंटरफेरोमीटर के गुरुत्वीय तरँग अंकित करने की
संवेदनशीलता में दस गुनी वृद्धि किये अभी चंद दिन ही हुए थे कि चित्र 16 में प्रदर्शित संकेत देखे गये।
कम्प्यूटर जनित तरँग जो चित्र 16 की दूसरी पंक्ति में दी गयी है और जो दोनो इंटरफेरोमीटर से निकली
तरँग से हूबहू मेल खाती है उसकी गणना से यह पता चला कि यह गुरुत्वीय तरँग पृथ्वी से 1.3 अरब
प्रकाश वर्ष की दूरी पर दो ब्लैक होल (श्याम विवर) की टक्कर से उत्पन्न हुई थी। इनमें से एक ब्लैक होल
सूर्य से 33 गुना भारी और दूसरी 29 गुना भारी थी तथा  चित्र 10 में वर्णित प्रक्रिया द्वारा जो नई ब्लैक
होल बनी वह् सूर्य से 62 गुना भारी थी। इस प्रकार सूर्य के 3 गुना भार का द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित
होकर गुरुत्वीय रेडियशन की तरँग के रूप में ब्रह्माण्ड में प्रसारित हो गया जिसकी अधिकतम चमक
3.6x1049 व्वाट थी। गुरुत्वीय तरँग के खोज की इस घटना का नामकरण GW150914 किया गया
जिसमें दो अक्षर गुरुत्वीय तरँग के लिये तथा बाकी दो-दो नम्बर क्रमशः वर्ष, माह एवं घटना की तारीख
प्रदर्शित करते हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि 1.3 अरब वर्ष पूर्व उत्पन्न होने वाली यह गुरुत्वीय तरँग
पृथ्वी पर ठीक उस समय पहुंची जब LIGO के दोनों इंटरफेरोमीटर की संवेदनशीलता को 10 गुना बढाये
अभी चंद दिन ही हुए थे। इस प्रसंग में मुझे 1973 में अमेरिका की बिंगघामटन यूनिवर्सिटी (SUNY) के
एक पापुलर लेक्चर की याद आती है जिसका शीर्षक था:
‘Lucky Accidents Prepared Mind & Great Inventions’ । वास्तव में अपने अथक परिश्रम
और असीम उत्साह की वजह से प्रोफेसर वाइस और प्रोफेसर थॉर्न तथा उनके एक हजार से भी बड़ी
वैज्ञानिकों की टीम इस अप्रत्याशित घटना के लिये मानसिक रूप से तैयार बैठे थे।

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चित्र 17. गुरुत्वीय तरँग की खोज के लिये 2017 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बायें से Prof. Barry E Barish,
Prof. Kip S Thorne एवं Prof. Rainer Weiss.

जब 1994 में प्रोफेसर बैरी बारीस LIGO के डायरेक्टर बने तो उन्होने दो अहम फैसले लिये थे।
उन्होने इंटरफेरोमीटर की क्षमता तथा संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए इस कार्य मे लगे वैज्ञानिकों की
संख्या 40 से बढ़ाकर 1000 कर दिया। उनका दूसरा बड़ा निर्णय  LIGO Scientific Collaboration
(LSC) नाम की संस्था बनाने का था जिसमें LIGO के अलावा दुनिया भर के वे वैज्ञानिक सदस्य बनाये
गए जो गुरुत्वीय तरंगों के बारे में जागरूकता के साथ शोध में लगे थे। प्रोफेसर वाइस, थॉर्न एवं बारीस
(चित्र 17), तीनो ने, गुरुत्वीय तरँग की खोज में लगे दुनिया भर के, हजार से अधिक वैज्ञानिको की इस
महान सफलता के लिये  मुक्तकंठ से प्रशंसा किया। जर्मनी के हैनोवर शहर स्थित 600 मीटर लम्बी
भुजाओ की अति सुग्राही इंटरफेरोमीटर वाली GEO600 नामक संस्था के वैज्ञानिकों ने LIGO के लिये
अति विशिष्ठ लेजर का विकास किया था। अतः जब 14 सितम्बर की दोपहर में इन वैज्ञानिकों ने अपने
कम्प्यूटर की स्क्रीन पर GW150914 के संकेत को देखा (क्योंकि वे LSC के सदस्य थे) तो उनकी
खुशी का ठिकाना नही था। उस समय हैन्फोर्ड मे सुबह के 3 बजे थे तथा लिविंग्सटन में 5 बज रहा था।
गुरुत्वीय तरँग की खोज में सार्वभौमिक समन्वित समय या Universal Coordinated Time (UTC)
का प्रयोग किया जाता है जो GMT की तरह ही है। ग्लास्गो यूनिवर्सिटी के गुरुत्वीय शोध संस्थान के
वैज्ञानिकों ने GW150914 संकेत को दिन में 9.51 UTC पर देखा। इसी वैज्ञानिक दल ने इंटरफेरोमीटर
के दर्पणों को लटकाने के लिये फ़्यूज्ड सिलिका के तार को बनाया था जिससे इसकी संवेदनशीलता दस
गुनी बढ़ गयी थी (चित्र 18)।
                               Do-it-yourself Quad Pendulum
चित्र 18. ग्लॉसगो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर  Ronald Drever जिन्होंने LIGO की संवेदनशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाई थी उनका GW150914 के कुछ ही दिन बाद देहांत हो गया। दायीं ओर इंटरफेरोमीटर के दर्पणों को लटकाने के
लिए 4 पेंडुलम व्यवस्था प्रदर्शित है जहाँ दर्पण सबसे निचले पेंडुलम के नीचे लटकाया जाता है। LIGO दर्पण पर पृथ्वी की
सतह में किसी प्रकार की हलचल का असर नही होता, यहां तक कि भूकम्प आने पर भी दर्पण बिल्कुल स्थिर रहते है। केवल
गुरुत्वीय तरँग के प्रभाव से दर्पण में कम्पन उत्पन्न होता है जो गुरुत्वीय तरँग के संकेत का निर्माण करता है।


वर्ल्ड साइंस फेस्टीवल के दौरान जब प्रोफेसर वाइस से GW150914 के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ने कहा कि संकेत की तीव्रता इतनी अधिक थी कि सन्देह उत्पन्न हो गया था। LIGO के हजारों छोटे छोटे अवयवों की जाँच में 4 महीने का समय लगाने के बाद पता चला कि उपकरण बिलकुल सही था और गुरुत्वीय तरँग का संकेत वास्तविक था। जब उनसे चित्र 16 के सबसे नीचे वाले पैनल के संकेत से निकलने वाली ध्वनि के बारे में पूछा गया तो उन्होंने ने कहा कि ब्लैक होल की टक्कर से कोई आवाज नही निकलती है। इस टक्कर से निकलने वाली गुरुत्वीय तरंगों की आवृत्तियाँ मनुष्य की श्रव्य सीमा के भीतर होती हैं जिससे इलेक्ट्रिकल संकेत को ध्वनि में परिवर्तित करने से आवाज सुनाई पड़ती है। चित्र 16 से पता चलता है कि 0.2 सेकेंड की गुरुत्वीय तरँग उत्पन्न करने वाली दोनो ब्लैक होल शुरू में एक दूसरे का 1 सेकेंड में 20 चक्कर लगाती हैं और जैसे जैसे एक दूसरे के करीब आती हैं उनके चक्कर लगाने की गति तेज होने लगती है। जब दोनों ब्लैक होल एक दूसरे में विलीन होकर नई ब्लैक होल का निर्माण करती हैं उसके ठीक पहले उनके चक्कर लगाने की गति 1 सेकेंड में 75 बार की हो जाती है। इस प्रकार चित्र 16 में प्रदर्शित गुरुत्वीय तरँग की आवृत्ति करीब 35 Hz से बढ़कर 75 Hz हो जाती है तथा 0.2 सकेंड में करीब 8 चक्र के बाद समाप्ति से पहले उसका आयाम अपने अधिकतम मान को प्राप्त कर लेता है। गुरुत्वीय तरँग की आवृत्ति एवं आयाम के समय के साथ इसी बदलाव के कारण जब इस संकेत को ध्वनि में परिवर्तित किया जाता है तो वह चूँ चूँ जैसा प्रतीत होता है। यहाँ पर यह बतलाना उचित है कि LIGO की दोनो भुजाओं में जंक्शन और किनारे के दर्पण के बीच एक एक और दर्पण लगाये गये है जिनके बीच करीब 300 बार परावर्तित होने के बाद दोनों बिम्ब जंक्शन पर व्यतिकरण उतपन्न करती हैं। इस प्रकार दोनो बिम्ब का समीकरण (3) में बताया गया प्रकाश पथ (L) 4 किलोमीटर से बढ़कर 1100 किलोमीटर से अधिक हो जाता है जिससे dL के मापन की क्षमता बढ़ जाती है। इसी प्रकार लेजर और जंक्शन के बीच एक विशेष वर्तन क्षमता का दर्पण लगाने से लेजर से 125 व्वाट के प्रकाश की तीव्रता व्यतिकरण के समय बढ़कर 750 हजार व्वाट हो जाती है, जिसकी वजह से व्यतिकरण फ्रिंजो की मोटाई बहुत कम हो जाती है। इन सभी अवयवों का पूर्ण विवरण देना यहां सम्भव नही है लेकिन LIGO की अदभुत प्रकाशीय विभेदन क्षमता के फलस्वरूप ही समीकरण (3) में dL के 10-18 मीटर के अति छोटे मान का मापन संभव हो सका है। आकाश के किस भाग में GW150914 का स्रोत है इसका अनुमान लिविंगस्टन और हैन्फोर्ड के संकेतों के बीच करीब 7 मिली सेकेंड के समय के अंतर के आधार पर किया गया। यह अनुमान है कि ब्लैक होल के इस जोड़े का विलयन आकाशीय मानचित्र के दक्षिणी भाग में  करीब 1000 वर्ग डिग्री (degree2) वाले क्षेत्र के भीतर हुआ था।
चित्र 19. युग्मक ब्लैक होल के विलयन से एक सेकेंड पहले शुरू होने वाली गुरुत्वीय तरँग की घटना GW151226
(सबसे ऊपर)। दोनो ब्लैक होल के विलयन से पहले विभन्न समय पर कम्प्यूटर जनित गुरुत्वीय तरँग के आकार जिसमे  
विलयन के समय की स्थिति बिल्कुल दायें है (बीच मे) । समय के साथ बदलती हुई दोनो ब्लैक होल की चक्कर लगाने की
गति तथा उससे उत्पन्न गुरुत्वीय तरँगें (सबसे नीचे)


अब तक करीब आधा दर्जन युग्मक (binary) ब्लैक होल के विलयन से उत्पन्न गुरुत्वीय तरंगों की खोज हो
चुकी है जिसमे 26 दिसम्बर 2015 की घटना GW151226 विलयन के 1 सेकेंड पहले से 3.39 UTC
पर अंकित की गई जैसा चित्र 19 में प्रदर्शित है। LIGO की गणना के अनुसार इस जोड़े में एक ब्लैक होल
का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का 14.3 गुना तथा दूसरे का 7.5 गुना था जो अब तक के सबसे हल्के
ब्लैक होल रहे। इनके विलय से बनने वाले ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य का 20.8 गुना रहा और इस प्रकार
करीब सूर्य के बराबर का द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित होकर गुरुत्वीय तरंगों के रूप में ब्रह्माण्ड में फैल
गया। ब्लैक होल के जोड़े के विलयन की यह घटना पृथ्वी से 1.4 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर हुई और
इससे निकलने वाले गुरुत्वीय रेडियशन की अधिकतम चमक 3.3x1049 व्वाट थी।


युग्मक (Binary) ब्लैक होल के विलयन की 3 इंटरफेरोमीटर द्वारा खोज
चित्र 20. Virgo वेधशाला के इंटरफेरोमीटर की 3 किलोमीटर लंबी पश्चिमी भुजा का हवाई जहाज से लिया चित्र (बायीं ओर)
तथा मानचित्र में Virgo के सदस्य देश


LIGO की तरह की ही Virgo नामक वेधशाला के वैज्ञानिक समूह में यूरोप के 6 देश सम्मिलित हैं। यह
प्रॉजेक्ट इटली तथा फ्रांस द्वारा शुरू की गई थी जिसके नीदरलैंड, पोलैंड, हंगरी और स्पेन बाद में सदस्य
बने थे। Virgo के विशालकाय माइकेलसन इंटरफेरोमीटर की दोनो लम्बवत भुजाओं की लंबाई 3
किलोमीटर है जैसा चित्र 20 में दिखाया गया है। यह वेधशाला इटली के, टेढ़ी मीनार वाले, पीसा शहर में
स्थित है तथा इसका नामकरण आकाश में Virgo समूह स्थित 1500 आकाशगंगाओं (galaxies) पर
आधारित है जो पृथ्वी से करीब 5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हैं। 14 अगस्त 2017 को 10:31 UTC पर
LIGO समूह तथा Virgo समूह के वैज्ञानिकों ने युग्मक ब्लैक होल के विलयन से उत्पन्न गुरुत्वीय तरंगों
का अवलोकन किया जिसे GW170814 नाम दिया गया। LIGO तथा Virgo के तीनों इंटरफेरोमीटर
में मिले गुरुत्वीय तरँगों के संकेत चित्र 21 के सबसे ऊपर के पैनल में दिखाये गये हैं। कम्प्यूटर की गणना
के अनुसार ब्लैक होल के इस जोड़े में एक का द्रव्यमान सूर्य के 31 गुना तथा दूसरे का 25 गुना था और
विलयन की यह घटना पृथ्वी से 1.8 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर हुई थी। इसमें विलयन के बाद बनने
वाले ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य के 53 गुना था तथा सूर्य का 3 गुना द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित होकर
गुरुत्वीय तरंगों के रूप में फैल गया जिसकी अधिकतम चमक 3.7x1049 व्वाट रही। केवल LIGO के
दोनों इंटरफेरोमीटर द्वारा इसकी स्थिति आकाशीय मानचित्र  में 1160 वर्ग डिग्री (degree2) के क्षेत्र में
निर्धारित किया गया जबकि तीनो इंटरफेरोमीटर की गणना से यह क्षेत्र घटकर मात्र 60 वर्ग डिग्री
(degree2) हो गया, जैसा चित्र 22 में प्रदर्शित है।


चित्र 21. तीनों इंटरफेरोमीटर में गुरुत्वीय तरंग की अधिकतम चमक अलग अलग समय पर हुई, सबसे पहले लिविंगस्टन में
उसके 8 मिली सेकेंड बाद हैन्फोर्ड में और फिर 6 मिली सेकेंड बाद पीसा में (सबसे ऊपरी पैनल)। समय के साथ गुरुत्वीय
तरंगों की आवृत्ति में परिवर्तन (बीच का पैनल) । तीनो इंटरफेरोमीटर के लिये कम्प्यूटर जनित  गुरुत्वीय तरंगें (सबसे नीचे का
पैनल)


चित्र 22. आकाशीय मानचित्र में LIGO एवं Virgo की सम्मिलित गणना से GW170814 की स्थिति का निर्धारण
(बायीं ओर) तथा अन्य 4 गुरुत्वीय तरंगों के स्रोतों की अपेक्षा GW170814 के स्रोत का सटीक निर्धारण (दायें चित्र में सबसे
नीचे)

तीन इंटरफेरोमीटर की मदद से हम आकाश में गुरुत्वीय तरँग के स्रोत की स्थिति का ज्यादा सटीक
अनुमान लगाने के अलावा इन अनुप्रस्थ तरंगों के ध्रुवण का भी आकलन कर सकते हैं।  आइंस्टीन की
जनरल रिलेटिविटी यह बताती है की गुरुत्वीय तरँग अपने प्रसार की दिशा के लम्बवत पड़ने वाले
काल-अंतराल (spacetime) की सतह में बारी बारी से संकुचन तथा फैलाव उत्पन्न करती है जिसे हम
चित्र 11 के माध्यम से पहले ही समझ चुके हैं। गुरुत्वीय तरँग में दो ध्रुवण संभव हैं जो + (plus) तथा
x (cross) के रूप में चित्र 23 के सबसे ऊपरी पैनल में दिखाए गए हैं। गुरुत्वाकर्षण के मेट्रिक सिद्धान्त
(metric theory) के अनुसार गुरुत्वीय तरँग के 6 प्रकार के ध्रुवण संभव हैं जिनमें उपरोक्त भी शामिल हैं
जैसा चित्र 23 में दिखाया गया है। गुरुत्वीय तरँग के विभिन्न ध्रुवण की जानकारी प्राप्त करने के लिये इस
तरह के इंटरफेरोमीटर की आवश्यकता है जो एक दूसरे के समांतर न हों। LIGO के दोनों इंटरफेरोमीटर
समांतर हैं मगर Virgo का झुकाव अलग दिशा में है। GW170814 का अध्ययन पहला मौका है जबकि
गुरुत्वीय तरँग के ध्रुवण की जानकारी मिली है। इस अध्ययन ने आइंस्टीन की जनरल रिलेटिवी के दो ध्रुवण
(a, b) को सही ठहराया और चित्र 23 की बाकी 4 संभावनाओं (c, d, e, f) को नकार दिया है।  
                        
चित्र 23. General metric theories of Gravity के अनुसार गुरुत्वीय तरँग में 6 प्रकार के ध्रुवण संभव हैं। आइंस्टीन
की General Relativity के अनुसार केवल (a) और (b) संभव है जिसमें गुरुत्वीय तरँग चित्र की सतह के लम्बवत पड़ती
है। गुरुत्वीय तरँग के तीर () की दिशा में प्रसारित होने पर चित्र की सतह पर ध्रुवण ( d, e, f) द्वारा प्रदर्शित हैं।
( Image credit: Clifford Will, Living Reviews in Relativity)


युग्मक (Binary) न्यूट्रॉन तारों के  विलयन से उत्पन्न गुरुत्वीय एवं विद्युतचुम्बकीय तरंगें


17 अगस्त 2017 को 12:41:06 UTC पर अंतरिक्ष मे स्थित फर्मी (Fermi) टेलीस्कोप के गामा
रेडिएशन के विस्फोट मॉनीटर (Gama-ray Burst Monitor) ने एक कमजोर से संकेत की सूचना दी
जिसका नामकरण GRB170817A किया गया। थोड़ी देर बाद हैन्फोर्ड के LIGO से 12:41:04
UTC पर गुरुत्वीय तरँग मिलने की सूचना मिली जिसका नामकरण GW170817 किया गया। वैज्ञानिकों
ने तुरंत Virgo और LIGO के डाटा का विश्लेषण किया तो पता चला कि गुरुत्वीय तरँग तथा
GRB170817A के समय यह प्रमाणित कर रहे थे (चित्र 24) कि दोंनो का उदगम स्थल पृथ्वी से 13
करोड़ प्रकाश वर्ष दूर NGC4993 नामक आकाशगंगा में है ।
         
चित्र 24. गामा रेडिएशन के विस्फोट की घटना GRB170817A के संकेत ऊपर के तीन पैनल में तथा गुरुत्वीय तरँग
GW170817 का 10 सेकेंड से अधिक अवधि का संकेत नीचे वाले पैनल में दिखाये गये हैं। ऊपर के दो पैनल में फर्मी
अंतरिक्ष टेलिस्कोप के संकेत हैं तथा तीसरे पैनल में इंटरनेशनल गामा रे एस्ट्रोफिजिक्स लैब (INTEGRAL) द्वारा प्राप्त
संकेत है।


जनरल रिलेटिविटी के समीकरण को हल करने पर यह पता चलता है कि एक दूसरे का चक्कर लगाते हुए
जब न्यूट्रॉन तारे के जोड़े (Binary Neutron Star या BNS) का विलयन होता है तो प्राप्त संकेत को
चूँ चूँ सी आवाज में बदला जा सकता है जैसा हम युग्मक ब्लैक होल के विलयन के संकेत (चित्र 16) में
देख चुके है। गणना के अनुसार युग्मक न्यूट्रॉन तारो के विलयन की चूँ चूँ के तुरंत बाद गामा रेडिएशन का
विस्फोट दिखाई पड़ना चाहिए। युग्मक न्यूट्रॉन तारो के विलयन से दमदार गामा रेडिएशन विस्फोट
(powerful gamma ray burst) होता है जबकि युग्मक ब्लैक होल के विलयन में कोई विद्युतचुम्बकीय
तरँग नही उत्पन्न होती।
    
चित्र 25. युग्मक न्यूट्रॉन तारों के विलयन की घटना की विभिन्न स्थितियों का एक चित्रकार की कल्पना पर आधारित चित्रण:
(1) दोनो तारे एक दूसरे का चक्कर लगाते और तेज गति से एक दूसरे के करीब आते हुए। (2) विलयन के क्षण में गुरुत्वीय
तरंगों और गामा रेडिएशन की उत्पत्ति। (3) तारों के द्रव्यमान के एक छोटे अंश का बाहर छिटककर ‘किलोनोवा’ के रूप में
विद्युतचुम्बकीय रेडिएशन उत्पन्न करना। (4) विलयन के बाद एक भारी न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल का बनना।

गुरुत्वीय तरँग और गामा रेडियेशन के तुरंत बाद किलोनोवा बन जाता है जो क्षणिक समय तक
दृश्य प्रकाश उत्सर्जीत करने के बाद इंफ्रारेड एवं अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन के स्रोत में परिवर्तित हो जाता है।
वास्तव में दृश्य प्रकाश की उत्पत्ति दोनो तारो की टक्कर के दौरान सोना, प्लैटिनम तथा अन्य भारी तत्वों के
बनते समय रेडियोधर्मी अपक्षय (decay) की वजह से होता है। इस तरह के रेडिएशन के स्रोत धीरे धीरे
हप्ते भर से अधिक समय तक सक्रिय रहते हैं जैसा चित्र 25 के पैनल 3 में दिखाया गया है। यह भी
अनुमान है कि विलयन की वजह से अत्यधिक ऊर्जा वाले कणों के शक्तिशाली धार (jet) के रूप में
निकलने से X-ray तथा रेडियो तरंगें उत्सर्जीत हो सकती है ।
             
चित्र 26. आकाशीय मानचित्र में गुरुत्वीय तरँग, गामा रेडिएशन तथा विद्युतचुम्बकीय तरंगों के द्वारा GW170817 की स्थिति
का निर्धारण: हल्के हरे रंग में (LIGO), हल्के नीले रंग में (Fermi/INTEGRAL) तथा गहरे नीले रंग में (LIGO/Virgo)
[बायीं ओर] । आकाशगंगा NGC4993 का चित्र न्यूट्रॉन तारों के विलयन के दिन [दायीं ओर ऊपर] तथा विलयन से
20.5 दिन पूर्व [दायीं ओर नीचे]

तीन इंटरफेरोमीटर की मदद से युग्मक न्यूट्रॉन तारों का विलयन-स्थल आकाशीय मानचित्र में 30
वर्ग डिग्री (degree2) के क्षेत्र में नियत किया गया जैसा चित्र 26 में बायीं ओर दिख रहा है। अब तक के
सबसे नजदीक (13 करोड़ प्रकाश वर्ष) तथा आकाश में अभी तक की सबसे सटीक स्रोत की स्थिति की
जानकारी के आलोक में वैज्ञानिकों को लगा कि GW170817 के बाद उत्सर्जीत विद्युतचुम्बकीय तरंगों
को भी देखा जा सकता है। अतः दुनिया भर की पृथ्वी तथा अंतरिक्ष की सभी टेलिस्कोप वेधशालाओं को
आकाश के उपरोक्त क्षेत्र में निगरानी के लिये सन्देश भेज दिये गये। इस संदेश के प्रसारण के 11 घण्टे के
भीतर ही एक तेज चमक वाला क्षणिक प्रकाश NGC4993 नामक आकाशगंगा के पास दिखाई पड़ा
जिसका नामकरण SSS17a किया गया। चित्र 26 की दायीं ओर ऊपर के फ्रेम में आकाशगंगा एक बड़े
काले धब्बे के रूप में दिख रही है जिसके ऊपरी बायें किनारे पर SSS17a एक काले बिंदु के रूप में
दिख रहा है। न्यूट्रॉन तारो के विलयन की इस घटना के 21 दिन पूर्व के NGC4993 की फोटो में दो पतली
रेखाओं के बीच में SSS17a का स्थान खाली है। SSS17a की जानकारी के बाद पृथ्वी तथा अंतरिक्ष
स्थित अनेकों टेलीस्कोप उसके निरीक्षण में लग गए जिससे उसके क्रमिक विकास को देखा जा सके।
प्रकाश की चमक तेजी से घटती गयी और उसका रंग नीले से बदलकर लाल हो गया क्योंकि
विद्युतचुम्बकीय तरंगों में सर्वाधिक उत्सर्जन अल्ट्रावायलेट से हटकर इंफ्रारेड की ओर खिसकने लगा था।
आरम्भ में SSS17a के स्पेक्ट्रम मे अल्ट्रावायलेट और दृश्य क्षेत्र में कोई स्पेक्ट्रमी रेखाएं नही थी मगर
कुछ दिन बाद  इंफ्रारेड क्षेत्र में अवशोषण जनित स्पेक्ट्रमी रेखायें दिखनी लगीं। SSS17a से सम्बंधित
ये सभी विशेषताएं सैद्धान्तिक जानकारी के आधार पर उसके ‘किलोनोवा’ होने की पुष्टि करती हैं।
किलोनोवा की वर्तमान खोज ने बहुत दिनों से सैद्धांतिक वैज्ञानिको के इस मत को सही ठहराया कि
लोहा (Fe) से भारी तत्वों का निर्माण दो न्यूट्रॉन तारों की टक्कर के बाद उनमें से छिटककर निकले
द्रव्यमान के न्यूक्लियर संश्लेषण द्वारा होता है।

चित्र 27. टेलीस्कोप में आकाशगंगा NGC4993 के फोटो का एनलार्जमेंट जिसमे SSS17a नीले रंग का दिख रहा है
(बायीं ओर)। न्यूट्रॉन तारों के विलयन के पहले का फोटो (बीच मे) तथा विलयन के बाद (दायीं ओर)



चित्र 28. (बायीं ओर): आकाशगंगा NGC4993 में GW170817 के स्रोत को काले रंग के वृत्त के केंद्र में दिखाया गया है
तथा उसी वृत्त को एक्सरे टेलीस्कोप से देखने पर 19 अगस्त को कुछ नही दिखता मगर् 26 अगस्त को वृत्त के केंद्र में तेज
चमक दिखती है। (दायीं ओर): चित्रकार की कल्पना में न्यूट्रान तारो के विलयन से उत्सर्जीत अत्यधिक ऊर्जा वाले कणो की
धार (jet), किलोनोवा तथा पृथ्वी से उसकी दृष्टि-रेखा (line of sight)

अंतरिक्ष की चंद्रा एक्सरे (Chandra X-ray) टेलीस्कोप ने पहली बार 26 अगस्त 2017 को
SSS17a की दिशा से संकेत प्राप्त किया जिसकी चमक में 2 सितम्बर तक कोई कमी नही आयी।
कम्प्यूटर मॉडल के आधार पर गामा रेडिएशन तथा X-ray दोनो का उदभव न्यूट्रॉन विलयन के बाद
अत्यधिक ऊर्जा वाले कणों की एक पतली और तेज धार (jet) के कारण होता है । हम पहले ही देख चुके
हैं कि फर्मी टेलीस्कोप द्वारा गामा रेडियशन के विस्फोट का संकेत काफी कमजोर था और यह अजब बात
थी क्योंकि वर्तमान घटना का स्रोत पूर्व में इस तरह की घटनाओं की अपेक्षा बहुत नजदीक था। चित्र 28
में बायीं ओर NGC4993 के पास एक वृत्त के भीतर GW170817 दिखाया गया है तथा वही वृत्त
X-ray संकेत के लिये भी दो बार ऊपर की ओर दिखाया गया है। हम देखते है कि ऊपर के वृत्त के केंद्र
में 19 अगस्त को कुछ नही है जबकि 26 अगस्त को वृत्त के केंद पर चमकदार X-ray संकेत दिख रहा है।
किलोनोवा के प्रकाश के 9 दिन बाद X-ray के देखे जाने के रहस्य को चित्र 28 में दायीं और गामा
रेडिएशन के उत्सर्जन की अक्ष और पृथ्वी से किलोनोवा की दृष्टि-रेखा (line of sight) के बीच के कोण
से समझा जा सकता है। आरंभ में गामा तरँग और X-ray तरँग चित्र में दिखाये गये शंकु (cone) की
अक्ष की दिशा में ही निकलती हैं लेकिन गामा तरँग की चमक बहुत् अधिक होने के कारण इसका कुछ
अंश पृथ्वी की दृष्टि रेखा की जद में आ जाता है मगर X-ray अपेक्षाकृत बहुत कम होती है। समय बीतने
के साथ किलोनोवा के क्षेत्र में X-ray का शंक्वाकार (conical) क्षेत्र फैलता जाता है और इस क्षेत्र के
पृथ्वी की दृष्टि-रेखा तक आने में 9 दिन से अधिक समय लग जाता है। इसी प्रकार किलोनोवा से निकलने
वाली रेडियो तरंगें GW170817 के 16 दिन बाद पहली बार देखी गईं।


युग्मक ब्लैक होल एवं युग्मक न्यूट्रॉन तारों के विलयन से उभरते वैज्ञानिक ज्ञान


     
चित्र 29. तारों की कब्रगाह:   गुरुत्वीय तरंगो द्वारा खोज की गईं अत्यंत भारी ब्लैक होल (नीले रंग में) तथा X-ray द्वारा
अप्रत्यक्ष रूप से खोजी गईं कम भार वाली ब्लैक होल। गुरुत्वीय तरँग तथा विद्युतचुम्बकीय तरंगों के माध्यम से खोजा गया
एकमात्र न्यूट्रान तारों का जोड़ा (पीले रंग वाले पैनल के बीचोंबीच) जबकि बाकी सभी न्यूट्रान तारे पल्सर के रूप में रेडियो
तरंगों के माध्यम से मिले हैं।


ब्लैक होल के बारे में 14 सितम्बर 2015 के पहले केवल अप्रत्यक्ष जानकारी थी जो किसी विशाल तारे से
उसके नजदीकी अदृश्य बिंदु की दिशा में उत्सर्जीत होने वाली X-ray तरंगो के माध्यम से प्राप्त हुई थी।
अब तक GW150914 के अलावा इस प्रकार की 5 अन्य घटनाओं की खोज हो चुकी है जैसा चित्र 29
के ऊपरी पैनल में दिखाया गया है। इसी प्रकार 17 अगस्त 2017 के पहले न्यूट्रान तारो के विलयन की
किसी घटना की जानकारी नही थी। 14 सितम्बर 2015 की LIGO द्वारा गुरुत्वीय तरंग की खोज
अप्रत्याशित एवं विज्ञान की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। खगोल विज्ञान में अभी तक हम टेलिस्कोप द्वारा
दृश्य एवं अदृश्य प्रकाश के माध्यम से सुदूर आकाशीय पिण्डों के बारे में जानकारी प्राप्त करते थे अब
गुरुत्वीय तरंगो के माध्यम से ब्रह्माण्ड के बहुत से छुपे रहस्यों से पर्दा उठने वाला है।
अभी तक युग्मक ब्लैक होल के बारे में बहुत कम जानकारी है। जब LIGO का निर्माण हुआ तो
यह उम्मीद की गई थी कि इसके द्वारा युग्मक न्यूट्रान तारों से निकलने वाली गुरुत्वीय तरंगो का मापन
संभव हो जाएगा। इसका कारण 1974 में युग्मक न्यूट्रान तारो (PSR1913+16) के बीच की दूरी का
लगातार कम होना था जो आइंस्टीन के गुरुत्वीय तरँग के उत्सर्जन के बिलकुल अनुरूप था। इस खोज के
आधार पर Hulse और Taylor को 1993 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से अलंकृत किया गया। जब
GW150914 का पता चला तो इस प्रचंड संकेत को देखकर वैज्ञानिक हैरान रह गये क्योंकि यह युग्मक
ब्लैक होल के विलयन से उत्पन्न हुआ था। दो वर्ष के भीतर आधे दर्ज़न युग्मक ब्लैक होल की खोज से यह
लगने लगा है कि सुदूर ब्रह्माण्ड में इनकी जनसंख्या अनुमान से बहुत अधिक है।  अब खगोल वैज्ञानिकों
की स्थिति कुछ कुछ जीवविज्ञानी की तरह हो गयी है जो जंगल मे किसी दुर्लभ प्रजाति का अध्ययन
करते हैं। अब अलग अलग ब्लैक होल की विशेषताओं का संबंध उनके एक बड़े समूह के साथ स्थापित
करना एक चुनौतीपूर्ण अध्ययन का विषय बन सकता है।
ब्लैक होल की बनावट काल-अन्तराल (spacetime) की विकृति (distortion) से जुड़ा है।
अतः दो छोटे ब्लैक होल के विलयन से बनने वाले ब्लैक होल को हम काल-अन्तराल की एक नई विकृति
के रूप में समझ सकते हैं जिसे एक बड़े द्रव्यमान और भिन्न प्रकार के घूर्णन (spin) द्वारा व्यक्त किया जा
सकता है। इसके विपरीत न्यूट्रान तारे न्यूक्लीय पदार्थ के बने होते हैं जिससे एक दूसरे का चक्कर लगाने
के दौरान एक के गुरुत्वाकर्षण के कारण दूसरे में उसी प्रकार की विकृति पैदा होने की संभावना है जैसे हम
समुद्र में ज्वार-भाटा के समय देखते हैं। न्यूट्रान तारे की यह विकृति इस बात पर निर्भर करेगी कि वह्
कितना ठस (compact) है। जो न्यूट्रान तारा  पिलपिला (fluffy) होगा उसमे गुरुत्वीय ज्वार का प्रभाव
ठस न्यूट्रान तारे की अपेक्षा ज्यादा होगा। अभी तक न्यूट्रान तारों के पदार्थ के बारे में पक्की जानकारी
नही है जिससे गुरुत्वीय ज्वार के प्रभाव का आकलन किया जा सके।
अगले कुछ वर्षों में जापान के कमिकोआ की 3 किलोमीटर लंबी भुजाओ वाली भूगर्भीय वेधशाला
का निर्माण पूरा हो जायेगा तथा भारत के पूना में 2 किलोमीटर लंबी भुजाओं वाली LIGO के तर्ज की
वेधशाला भी बनकर तैयार हो जाएगी। इस प्रकार पृथ्वी के 5  अलग अलग स्थानों से गुरुत्वीय तरँग के
निरीक्षण की सुविधा उपलब्ध होने से ब्रह्माण्ड की भीषण गुरुत्वाकर्षण वाली घटनाओं के बारे में नई
जानकारी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
अगले एक दशक में 3 भूस्थिर उपग्रहों की मदद से हजारों किलोमीटर लंबी भुजाओं वाले लेजर
इंटरफेरोमीटर बहुत कम आवृति (100nHz - 0.1Hz और 0.1Hz - 10Hz) की गुरुत्वीय तरंगों के
निरीक्षण के लिये उपयोग में लाये जायेंगे। इस दिशा में LISA (Laser Interferometric Space
Antenna) नामक प्रोजेक्ट पर दिसम्बर 2015 से काम भी शुरू हो गया है।


गुरुत्वाकर्षण, ब्लैक होल और लेजर पर कुछ पठनीय साहित्य

1. A. Einstein, “Spacetime” Encyclopedia  Britannica 13th ed (1926)
2. A. A. Michelson and E. W. Morley, “On the Relative Motion of the Earth and theLuminiferous Ether,”
Am. J. Sci. 34, 333–335 (1887)
3. K.S. Thorne, “Black Holes & Time Warps”,   W. W. Norton & Company (1994)
4. S. Chandrasekhar, “The Highly Collapsed Configuration of a Stellar Mass”,  
Monthly Notices Royal Astro. Soc. 95 (1935) 207
5. F. Hoyle, “On Nuclear Reactions Occurring in Very Hot Stars’,
Astrophys. J. (Supplement) 1 (1954) 121
6. Mario Livio, “Brilliant Blunders: From Darwin to Einstein”, Simon & Schuster (2013)
7. A.K. Ghatak, A. Pathak, V.P. Sharma (Eds), “Light and its Many Wonders”, Viva Books (2015)
8. D.K. Rai and S.N. Thakur, “Atom, Laser & Spectroscopy”, Prentice-Hall of India (2013)
9. William H. Bragg, “The World of Sound”,  Royal Institution (1920)
10. William H. Bragg, “The Universe of Light”, Royal Institution (1933)


आभार
इस लेख की प्रेरणा मुझे 2017 के अपने  कैलिफोर्निया प्रवास के दौरान मिली। फिजिक्स में नोबेल पुरस्कार की घोषणा के बाद
3 अक्टूबर को मुझे प्रोफेसर रेनर वाइस (Rainer Weiss) और प्रोफेसर किप थॉर्न (Kip Thorne) के  संक्षिप्त वेबकास्ट सुनने का
सौभाग्य मिला। हमारे पूर्व सहयोगी प्रोफेसर अलख निरंजन मंत्री ने रिलेटिविटी और गुरुत्वाकर्षण पर आइंस्टीन की क्लिष्ट
अवधारणाओ को समझने में अप्रतिम सहयोग किया। डॉक्टर रमाशंकर सिंह मुझे सांता क्लारा में फोटानिक सोसायटी के तत्वाधान में
ब्रायन लांज (Brian Lantz) के इस विषय पर दिये गये लेक्चर में ले गये तथा मुझे अनेक प्रकार से उत्साहित करते रहे। अपने
गुरुत्वीय तरंगों की खोज विषयक  लेक्चर के पावर पॉइन्ट प्रदर्शन की तैयारी के दौरान ब्लैक होल के विलयन से प्राप्त LIGO से
निकलने वाली ध्वनि तथा अन्य एनिमेशन (animation) को चित्रित करना, विनीता, सुधीर और संगीता के सहयोग के बिना
असंभव था। इस लेक्चर के हमारे पहले श्रोता 15 वर्षीय आकाश एवं प्रतीक थे जिन्होंने ब्लैक होल की समानता गंगाजी के
चकोह से तथा LIGO की 360o दृष्टि की उल्टी दिशा में बैठे साइकिल सवारों के उदाहरणों की सराहना कर  मेरा उत्साहवर्धन किया।
उदय प्रताप कालेज, वाराणसी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अपने हिंदी-अंग्रेजी (Hinglish) में दिए गये
भाषणों से मुझे इस हिंदी लेख के लिए बहुत प्रेरणा मिली। स्पेक्ट्रोस्कोपी की पूर्व शोध छात्रा सुश्री शशि किरण सिंह ने इस लेख के
पहले मसौदे को पढ़कर कई रचनात्मक सुझाव दिये। उपरोक्त सहयोग के बिना मेरे लिए इस क्लिष्ट विषय पर लिखना असम्भव था
अतः मैं सबका ह्रदय से आभारी हूँ। इस लेख में प्रस्तुत तथ्य इंटरनेट पर LIGO, Virgo तथा NASA की वेबसाइट पर प्रस्तुत अंग्रेजी
लेखों से लिए गए है। मेरी 75 वर्ष की आयु में स्वस्थ रखते हुए, कार्य के दौरान कैलिफोर्निया में मिशेल ने तथा बनारस में पूनम ने मेरी
सभी सुख सुविधाओं का ख्याल रखा तथा लिओ और मिआ ने अपनी बचकानी हरकतों से मुझे बोरियत से दूर रखा जिन्हें यह
लेख स्नेह के टोकन के रूप में समर्पित है।

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